SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 84
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ डिसेम्बर २००७ . ७७ चित्रकला-पद्धतिनी घेरी असर तेमां डोकाय छे. ३. आ. चन्द्रकीर्तिसूरि ते नागपुरीयबृहत्तपागच्छना प्रसिद्ध ग्रन्थकार आचार्य होवानुं जणाय छे, अने तेमनी नजर हेठळ दोरायेल आ यन्त्र होई ते सम्पूर्णत: अधिकृत दस्तावेज बनी रहे छे. ४. अने सौथी वधु महत्त्वपूर्ण वात ए छे के आ चित्र एक मुसलमान चित्रकारे आलेखेलुं छे. आधुं शुद्ध साम्प्रदायिक के धार्मिक, ते पण विज्ञानना विषय- होवाथी जटिल, चित्र एक मुस्लिम चित्रकार दोरे, अने वळी ते चित्र पर तेनुं नाम पण लखाय, ए साचे ज एक दुर्लभ घटना छे. आ ज कारणे आ चित्रनुं मूल्य अनेक रीते वधी जाय छे. मि० एटले मिर्जा होय तेम अटकळ थाय छे. चित्र आगरामा दोरायुं छे, तेथी त्यां मुघल बादशाहो द्वारा प्रेरित चित्र-शालाओमांना कोई चित्रकारे आ चित्र आलेख्युं होय तो ते सम्भवित गणाय. प्रसंगोपात्त, आ चित्र परत्वे एक बे मुद्दा तरफ सुज्ञ जनोनुं ध्यान दोरवू छे. आ चित्रनो सीधो अने स्पष्ट सम्बन्ध Jain Cosmology साथे छे. परन्तु ते बाबतने लक्ष्यमां लीधा विना ज आ चित्रने, तेमज जैन सृष्टिविज्ञान साथे सम्बद्ध एवा, जम्बूद्वीपना तेमज अढी द्वीपना इत्यादि चित्रपटो के चित्र-यन्त्रोने पण, तान्त्रिक मार्गनी उपासनाना यन्त्रो तरीके, दुनियाभरना विद्वानो ओळखे छे, छापे छे तथा प्रचारे छे, जे तद्दन अवास्तविक तथा अज्ञानमूलक स्थिति छे. Tata जैवी विविध कम्पनीओनां वार्षिक केलेन्डर्स होय, डायरी होय के पछी 'Tantra' विषयक देशी-विदेशी लेखकोनां सचित्र पुस्तको होय, अनेक स्थानोमां आ लोकपुरुषना यन्त्रने तान्त्रिक यन्त्रलेखे छापवामां तथा ओळखाववामां आवेल छे. एक खास परम्परा विषेना पोताना अज्ञानने पोतानी लाक्षणिक शोध के प्रतिपादन रूपे दर्शाववामां विद्वत्ता केटली ? संशोधन केटलुं ? वैज्ञानिकता केटली ? तेवा सवालो कोईने जरूर थाय. बीजो मुद्दो एवो छे के आ चित्र जैन दृष्टिए सृष्टिविज्ञान- चित्र छे. आजे व्यापक रूपमा स्वीकारायेल विज्ञान, आ मान्यताने साम्प्रदायिक, पुराणी, अने तेथी अवास्तविक भले गणे. पण आजथी सेंकडो वर्षों पूर्वे, ज्यारे आधुनिक विज्ञान कदाच गर्भावस्थामां हशे, विज्ञानने विज्ञानलेखे प्रमाणित करे तेवां यन्त्रो, टेलिस्कोपिक साधनो वगेरे ज्यारे नहोतां, अने जे मानवसर्जित Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.520542
Book TitleAnusandhan 2007 12 SrNo 42
Original Sutra AuthorN/A
AuthorShilchandrasuri
PublisherKalikal Sarvagya Shri Hemchandracharya Navam Janmashatabdi Smruti Sanskar Shikshannidhi Ahmedabad
Publication Year2007
Total Pages88
LanguageSanskrit, Prakrit
ClassificationMagazine, India_Anusandhan, & India
File Size4 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy