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________________ फेबुआरी - 2006 35 काव्यं ॥ जिनेन्द्रकल्पोत्तममर्त्यकल्प-रत्नाकरं धर्मकथानुयोगैः ।। स्वसाध्यसंसाधनसाधनाय युगानुयोगागमकं यजामि ॥१॥ ह्रीं श्रीदृष्टिवादे ॥ अनुयोगसूत्रेभ्यः कु० ॥४॥ ढाल ॥ हिव चूलिकाजी पांचमो श्रुति सूत्र धार ए । चउ द्वादशजी गज काष्टा सुखकार ए । सहु एकत्रजी अतिशय परिमित भाव ए । आदिम चउजी पूरव चूलिका ध्याव ए । त्रूटक ॥ ध्यावज्यो मुनिवर अनुक्रमें कर विविध अरथ निधान ए । चूलिका संयुत जलधिपूरव रहित शेष सुजान ए । किम अंगचूलिका वंगचूलिका व्यवहारचूलिकादि भाव ए । भवि शुद्ध भावें चूलिका श्रुति कुसुमांजलि चाढो ध्याव ए ॥५॥ हीं श्रीदृष्टिवादे चूलिकासूत्रेभ्यः ॥ कु० ॥५॥ इति पंच कुसुमांजलि ॥ दोहा ॥ बारम अंगगत तीसरो, पूरवगत अधिकार । तिन कारन परथम भणी, कुसुमांजलि सुविचार ॥१॥ हिव परतेकें वरणउं, पूरव चउद विधान । मुनिवर भावे सेवना, सरावग दरव-परधान ॥२॥ ढाल ॥ पंच कल्याणकं ॥ ए चाल || राग देशाख । पुरव उत्तर मुखें पीठत्रिक रचि सखें । विविध मणिरतन वर भासकं ॥ अ० ॥ भा० ॥१॥ चवद पुसतक धरी थापना आदरी । करीय वास-पूज उल्हासकं ॥ अ० ॥ ल्हा० ॥२॥ नान उपगरण सुचि चवद चाढो रुचि । चवद वसुदरव पूज आदरो ||अ० ॥आ०॥३॥ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.520535
Book TitleAnusandhan 2006 02 SrNo 35
Original Sutra AuthorN/A
AuthorShilchandrasuri
PublisherKalikal Sarvagya Shri Hemchandracharya Navam Janmashatabdi Smruti Sanskar Shikshannidhi Ahmedabad
Publication Year2006
Total Pages98
LanguageSanskrit, Prakrit
ClassificationMagazine, India_Anusandhan, & India
File Size5 MB
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