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________________ फेबुआरी - 2006 दोहा ॥ प्रणमुं संयम पास जिण सुभ सामी गणधार । चउद पूरव पूजन रचुं अभिमत फल दातार ॥१॥ ढाल ॥ जिन रयणीजी ॥ ए चाल ॥ भवि भाजी चउद पूरव पूजन करो । दृष्टिवादें जी एह भाव चित आदरो । इग सुइखंधजी संख्येय वसतू पाहुडो । पाहुडपाहुडजी पाहुडिया संख्य आवडो ॥ त्र्टक॥ पाहुडि पाहुडिया संख्य जाणो संख्य लख पद मान जो । सरव भाव परूवना इहां मुनिवर हिय. आनजो । परिकर्म १, सूत्राणि २, पूरवगत ३, तिम अनुयोग ४, चूलिका ५, नान ए॥ परिकर्म नगविध सर्वभेदे कुसुमांजलि मेलो मान ए ॥१॥ काव्यं ॥ श्रीसिद्धपंक्त्यादिकशैलमूलोत्तरानिलेभोन्मितभेदभिन्नम् ।। श्रीदृष्टिवादे परिकर्मसूत्रं नमामि भक्त्या सु(शु) भदर्शनाय ॥१॥ मुहीं श्रीदृष्टिवादे श्रीमत्परिकर्मसूत्रेभ्यः कुसुमाञ्जलिं यजामहे स्वाहाः ॥१॥ ढाल ॥ सूत्राणी जी बीजी परूवना धार ए। रिजुकादी जी बावीस सूत्र विचार ए । मुनि भावो जी भाग विभाग मतिसार ए । सहु भेदें जी खगकृत्य नग अधिकार ए । त्रूटक ॥ अधिकार नख युग छिनछेयण सूत्र ससमय जान ए । तिम अछित्रछेयन सूत्रपाटी आजीविकमत मान ए । गुपति-नय राशि तीजै चउनय ससमय नान ए । इम अठ्यासी सूत्र भावें कुसुमांजलि अहिठान ए । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.520535
Book TitleAnusandhan 2006 02 SrNo 35
Original Sutra AuthorN/A
AuthorShilchandrasuri
PublisherKalikal Sarvagya Shri Hemchandracharya Navam Janmashatabdi Smruti Sanskar Shikshannidhi Ahmedabad
Publication Year2006
Total Pages98
LanguageSanskrit, Prakrit
ClassificationMagazine, India_Anusandhan, & India
File Size5 MB
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