________________
१.
[85]
श्रीमत्पण्डितराजसागर सुधीः शिष्यो महानन्दनं श्रीपार्श्वं रविसागरस्त्व मगसीचूडामणी नौत्यलम् ॥ ७
३. रविसागर - कृत - आदिनाथ - स्तवन (सुखभक्षिका - नाम-गर्भित ) (राग केदार फाग)
श्रीसंघे वर साकर जय नृपमोदक सेव विमलजले बीजे सदमरकीर्तित जिनदेव | हिंगुल खण्ड विभारुण ममलाप सीमदान भविकं सार चकार तयिन पदकमलममान ॥ १ वरसोलाघबदाम य चारो ली निमजाभ [जन ] पस्तांतिम खारिक भीत इभाव सुलाभ ॥ सुदमी दुष्क निशाकर कोहलापाकरपाहि वितशोकाकबली वृष खंडर परमयशाहि || २ अखहलां कक कूलिर खरमांगतनिद्राख आटोपरां सदा फल करणी पयडाशाख । सार विचार बिदाडिम रतबत नालीकेर अकरमदां बकपूरक महसां तनु असुबेर || ३ केलांगुलि नारिंगक जम्बीरांचिततान मतिरां जायफला लिंब 'कमरख नेमूस्त्वान । अकलिंबुधवर जांबुधिजरगोजांकिरबोर करीति कृत परायण पीलु गतेरकठोर ॥ ४ वालुरणीनविडांगर डोडाध्यान लविंग
कर्मक्षपणेगांतवनाददवत्तरसंग |
वीतराब मरी तेल भाजी कल मधमाल क्षीर दही नृपानत सोपारी रससार ॥ ५
(कलश)
श्रीतपगणाधिपहीरविजयगुरु गच्छभूषितबुधवर
Jain Education International
For Private & Personal Use Only
www.jainelibrary.org