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नीरस निष्फल निग्गुण इ, दैवि विडंबी मेल्हि ।। ४२९ देव कि दिउ सिरि माहरइ, जउ खर-खग्ग-पहार ।। वल्लह-विरह-विछोहियां, तउ तउं जाणइ सार ॥ ४३० दैवह दाखउं वाटडी, जइ देखउं निय-अंखि । विरह-विछोह्यां माणसां, कांइ न सिरजी पंखि ॥ ४३१ देव दया करि माहरी, नवि भाजी जिम आस ।। तिम तरुणी तारुण्ण-रस, ढोलि म ढोलि निरास ॥ ४३२ नाह-सरिस गुण गोरडी, नव-रंग नागर-वेलि । जइ सिरजी फल-हीणगुण तोइ सकुंपल मेल्हि ॥ ४३३
गाथा इअ पुप्फावि(वइ) पेम, खेमं नाऊण पाण-नाहस्स । पुणरवि पिय-हिय-कज्जं, गय-लज्जं भणइ सुणि नाह ॥ ४३४ मम सूइसि निच्चं तो, कंत कयंत व्व तुम्ह पाण हो । पच्चूसे पिय एसो नरराओ कूड-विक्खाओ ॥ ४३५ ता अद्ध-रज्ज-सिन्नं, हय-गय-रह-सुहड-सार-संकिण्णं । मेलित्तु झत्ति चिट्ठसु, चंपापुर बहिय-उज्जाणे ॥ ४३६ अह सुणिय तीइ वयणं सुदिट्ठनयणं कुमार सार-बलो । कोवाकुल-चल-चित्तो, जुत्तो सिनेण संचलिओ ॥ ४३७
दुमिला पसरंत-उतंग-तुरंगम-संगम-तुंग-तरंग-चडंत-घणं मय-मत्त-महागिरि-सुंदर-सिंधुर-बंधुर-सेतु-सुबंध भणं । वर-नक्क-सुयक्क-महारह-संकुल-मच्छ-सुकच्छ-व सूर-नरं कुमरिंद नरिंद महाबल-सायर-दीसत कायर-पाण-हरं ।। ४३८
अडिलदूहउ पाण-हरण-पक्खर-घग्घरीव हणणहणहण-हय हिंसारव । खुर-रव-खेहि सूर-कर ढंकिय गह-गण इंद चंद सुर संकिय ॥ ४३९
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