SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 16
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ [11] भंजइ जे भुजवलि भूव-आण, खंडइ खल खित्ति जे गुरुअ-माण ।। छंडइ छलि छोत्तिए कुलह नारी, विण-सत्थि कहिज्जइ तिन्नि मारि ॥९४ आज्ञाभङ्गो नरेन्द्राणां० ॥ पिण किज्जइ कारणि उच्च कज्ज, जिह करताँ नावइ लोय लज्ज । सक्कर खंताँ नइ पडइँ दंत, तिहँ जडिय न मूलीय मंत तंत ॥९५ जिणि पसरई चिहुँ दिसि चाय-कित्ति, तिणि वंछइ मूढ सु कुण अकित्ति । जं दाण भणिज्जइ जग-पहाण, तिहि करइ किसउँ नरराय आण ॥९६ जं दिताँ होइ सुहु अउ(इ?) अम्ह, रूसउ जण दुज्जण करउ नम्म । खज्जंत दियंताँ जाइ लच्छि, सा जाउ सुजिनी वलि न पुच्छि ।।९७ इम चिंतवि चालिउ चतुर कुमार, दिइ पुणरवि दुत्थिय दाण-सार । धण कंचण कप्पड अइ अपुव्व, जं चडइ हत्थि तं दियइ सव्व ॥९८ जं जीवह जारिस सहज भाउ, नवि मिल्हइँ ते तिम निय-सहाउ उक्कालिय जल जिम सीय होइ, जगि नहीं सहज पडियार कोइ ॥९९ जइ वास सयं गोवालीया, कुसमाणिय बंधइ मालिया। ता किं सहाव-धिय-गंधिया, कुसमेहिँ होइ सुगंधिया ॥१०० पद्धडी छंट इम जाणि वलि कुपिउ नरेस, दिद्धउ डसिआहरि तसु विदेस । रक्खिय रोसग्गलि राय-बार, जिहँ हुंतउ अणुदिण नवि निवार ॥१०१ वस्तुः कुमर पिक्खिय कुमर पिक्खिय राय कुपसाय, चिंतइ इम नियह मनि, करउँ केम अह माण-कज्जिहिं, जउ आइय मुझ वसण, नवि कावि नहीं मुझ ईह रज्जिहिं, अविणय अनयत्तण रहिय, जइ एमुसुण दोस (एम्वइँ पुण ?) लउ मइँ इह रहिवउँ नहीं, आइ न होइ न जोस? ॥१०२ गाथा वाहि-दलिद्द-मलिन्ना, वि माण-वसणागमे मणस्सीणं नन्नत्थ सुहं सयलं, देसंतरं-गमण-विमणाणं ॥१०३ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.520508
Book TitleAnusandhan 1997 00 SrNo 08
Original Sutra AuthorN/A
AuthorShilchandrasuri
PublisherKalikal Sarvagya Shri Hemchandracharya Navam Janmashatabdi Smruti Sanskar Shikshannidhi Ahmedabad
Publication Year1997
Total Pages142
LanguageSanskrit, Prakrit
ClassificationMagazine, India_Anusandhan, & India
File Size6 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy