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________________ [53] मा प्रसवानव पूत्र थाय (?), जनम्यो पूत्र हरणे तस माय मूरत जोवा मांडि घडी, धवलमंगल गाई गोरडी ॥ कुंकमनां किधां छांटणां, पंच सबद तिहां वाजई घणां तलीआं तोरण बांध्यां बार, जोवा आवई नरनइं नार ॥ ११ दसमई दिन तस दिधुं नाम, इंद्रभुत रूपइं अभीरांम दिन दिन वाधई चढती कला, सीखई सास्त्र सवे आंमला ॥ १२ च्यार वेद मुखपाठई करई, वांणी संस्कृत मुखइं उचरइ वादि सवे मनावि आंण, इंद्रभुत विद्यानी खांण ॥ समोसर्या तिहां विरजिणंद, समोसरण रचई सुरइंद त्रगडई बइठा त्रिभुवनस्वामि, जाइं पाप जस लिधइं नाम ॥ १४ जेहनइं छ; अतिसय चोत्रीस, वांणी गुण जेहनइं पांत्रीस जोजनभुमि देसना विस्तरइं, भविक जिवना संसय हरई ॥ १५ इंद्रभुत करई जगनारंभ, रचिओ मंडप रोप्यो थंभ वेदाध्ययन करई विप्रषनवा (?), विद्या कुंभतणी परई भर्यां ॥ १६ आवई रिषनई आवई देव, इंद्रभुत तस सारई सेव हवन करई मंत्राक्षर भणी, देवदुंदुभी आकासई सुणी ।। जे (जै)न देव ए कुंण आवीओ, आउंबर एतो लावीओ हुं जइंनइं जीतुं एहनइं, सीस नमावीइ सुर जेहनइं ॥ एम कही चाल्यो जेतलई, समोसरण दिलु तेतलई सीह दिठई गज मुंकई मांन, इंद्रभुत मुकउं अभीमांन ॥ ए को ब्रह्मा ए को ईस, चंद सूर कई ए जगदीस अणसमझ्यें हुं आव्यो वही, ए साधइं जीते स्युं नहीं । २० मन केरी संदेह भांजस्यइं, इंद्रभुत तो चेलो थस्यें इम कही आघो आवीओ, वीरई नांमई बोलावीओ ॥ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.520507
Book TitleAnusandhan 1996 00 SrNo 07
Original Sutra AuthorN/A
AuthorShilchandrasuri
PublisherKalikal Sarvagya Shri Hemchandracharya Navam Janmashatabdi Smruti Sanskar Shikshannidhi Ahmedabad
Publication Year1996
Total Pages130
LanguageSanskrit, Prakrit
ClassificationMagazine, India_Anusandhan, & India
File Size6 MB
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