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________________ पेम से मझे प्रेम है देख लेता! और अब मेरा क्या होगा? उनके रहते-रहते मैं मुक्त अपनी कल्पना को भी मैं किनारे की बात से भ्रष्ट नहीं करता। न हो सका, अब मेरा क्या होगा? अब तो गहन अंधकार है और सहारे की बात ही गलत है। बे-सहारा! जब तक तुम इतने दीया भी बुझ गया। क्या उन्होंने कुछ मेरे लिए संदेश छोड़ा है? | बे-सहारा न हो जाओ कि तुम्हें लगे अब अपने ही पैरों पर खड़ा तो राहगीरों ने कहा, हां। आखिरी समय में उन्होंने आंख खोली; होना होगा, और कोई पैर नहीं हैं; अब अपनी ही बुद्धि को उन्होंने कहा, गौतम यहां नहीं है; लौटे तो उसे इतनी बात कह जगाना होगा, और कोई सहारा नहीं है; और अपने ही प्राणों का देना कि तू पूरी नदी तो पार कर गया, अब किनारे को पकड़कर उत्कर्ष करना होगा, कोई और आशीर्वाद, कोई और सांत्वना नहीं क्यों रुक गया है? | है...। तुमने कभी सोचा? / कहते हैं, उसी क्षण गौतम ज्ञान को उपलब्ध हुआ। क्या कहा आस्कर वाइल्ड ने लिखा है कि जब नाव डूब जाती है किसी महावीर ने उसके लिए? क्या संदेश छोड़ा कि तू पूरी नदी तो पार की और आदमी सागर में तड़फड़ाता है तो जैसी उसकी दशा कर गया-संसार छोड़ दिया, धन छोड़ दिया, पत्नी छोड़ दी, होती है, जब तक तुम्हारी न हो जाये तब तक तुम कुछ करोगे न। घर-द्वार छोड़ दिया, सब छोड़ दिया, सब तरफ से राग हटा नाव डूब गई। सागर की उत्तंग तरंगें, किनारे का कोई पता लिया–अब तूने राग मुझ पर जमा लिया! किनारे को पकड़ नहीं—तब क्या दशा होती है? तब तुम सोचते हो कि आयेगा लिया। अब तू कहता है, गुरु...। यह भी छोड़ दे, नहीं तो नदी किसी का आशीर्वाद या उसको बचाना होगा बचायेगा? नहीं, तो पार कर आया, अब किनारे को पकड़कर अटका है, तो बाहर तब तुम प्राणपण से, अपनी समग्र ऊर्जा से बचने की चेष्टा में कैसे निकलेगा? अब यह भी छोड़। जब सब छोड़ा है तो सभी लग जाते हो; तुम सागर से लड़ने लगते हो। उस समय न तो छोड़। अब इतना भी अपवाद मत रख। विचार रह जाते हैं। कहां विचार की जगह है? सुविधा कहां उसी क्षण गौतम को बोध आया कि अरे, मैं महावीर को | है? फर्सत किसे है उस समय विचार करने की? जीवन संकट पकड़ने के कारण ही रुक गया हूं! यह मोह छूटता नहीं, इसलिए में है। न विचार रह जाते हैं। कितनी बार ध्यान किया था और न रुक गया हूं। | लगा था; उस दिन लग जाता है। अब कोई विचार नहीं रह तो जैन भाषा अमोह की भाषा है। वहां आशीर्वाद नहीं है। जाते। न कोई कामना उठती, न कोई वासना उठती, न धन, न डूब जाये कि सलामत रहे किश्ती मेरी स्त्री, न संसार, कुछ भी नहीं, सब खो जाता है। सिर्फ एक स्वयं न हाथ बढ़ा कभी खिज्र के दामन की तरफ। को बचाने की-वह भी भाव की दशा होती है, विचार नहीं --चाहे डब जाये, चाहे बचे नाव: लेकिन महावीर कहते हैं. होता। और तम जझने लगते हो सागर से। किसी और की तरफ हाथ बढ़ाना मत। न हाथ बढ़ा कभी खिज्र महावीर कहते हैं, ऐसी ही तुम्हारी स्थिति होनी चाहिए। ऐसी कसी सदगरु की तरफ हाथ मत बढाना। ही स्थिति है, लेकिन तमने कल्पना की नावें बना रखी हैं और आशीर्वाद मत मांगना। डूब जाए तो भी ठीक है, पार हो जाये तो | तुमने कल्पना के सहारे ले रखे हैं। उन सहारों के कारण तुम भी ठीक है, लेकिन भीख मत मांगना। चेष्टा नहीं कर पाते जितनी कि कर सकते थे। इसलिए वे कहते महावीर का पथ सम्राटों का पथ है, भिखारियों का नहीं। हैं, हटा लो सारी सांत्वनाएं। मेरी फितरत है तूफां और मैं आशोबे-फितरत हूं। महावीर ने अपने साथ चलनेवालों के सब आश्रय छीन लिये। तसव्वुर का भी दामन तर नहीं करता मैं साहिल से। उनको बे-आसरा कर दिया, ताकि उनके भीतर जो सोए हुए -स्वभाव मेरा तूफान का है। प्राणों की ऊर्जा है वह इस चुनौती में उठ जाये, ज्योतिर्मय हो उठे। मेरी फितरत है तूफां और मैं आशोबे-फितरत हूँ। मुकाबिल में तेरे लाखों खुदा इसने बनाए हैं -और मैं प्रकृति की मुक्त निगाह, मुक्त दृष्टि हूं। तसव्वुर | उन्हें पूजा है, उनकी बंदगी के गीत गाए हैं। का भी दामन तर नहीं करता मैं साहिल से—साहिल की तो बात आदमी ने असली परमात्मा की जगह न मालूम कितने ही नहीं करता, किनारे की तो बात ही नहीं करता। बात तो दूर, परमात्मा बनाए हैं। उन्हें पूजा, उनकी बंदगी के गीत गाए हैं। 309 Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.340114
Book TitleJinsutra Lecture 14 Prem se Muze Prem Hai
Original Sutra AuthorN/A
AuthorOsho Rajnish
PublisherOsho Rajnish
Publication Year
Total Pages1
LanguageHindi
ClassificationAudio_File, Article, & Osho_Rajnish_Jinsutra_MP3_and_PDF_Files
File Size35 MB
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