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________________ सावधान ! आप देवद्रव्य के कर्जदार तो नहीं हैं, ना..?? दुर्गती की हारमालाओंसे बचने के लिए इतना अवश्य पढकर समज लिजीए ! साकेतपुर नामके एक नगरमें एक श्रेष्ठिने एक हजार कांकणी (रुपये) देवद्रव्य का बकाया कर्जा (राशी) नहीं भरकर घोर दुष्कर्म बांधा और बिना आलोचना किए मृत्यु के शरणमें जाकर जल मनुष्य-महामत्स्यके भवोमें 6-6 महिना घटीमें पिसाते हुए महावेदना भोगकर अनुक्रमसे सातवी नारकीमें दो-दो बार उत्पन्न हुआ...... उसके बाद समय के अंतर से या निरंतर. सुवर के बकरी के मृग के Eree हजार भव कुल्ले के हजार भव बिल्ली के हजार भव बिच्छू के हजारभव शंख के हजारभव मख्खी के हजार भव हजार भव चहे के हजार भव पृथ्वीकाय के हजार भव छीप के हजारभव भंवरे हजार भव हजार भव नेउर के हजार भव अपकाय के' हजार भव मच्छी के हजार भव कछुए के हजार भव हजार भव चिपकली के हजार भव तेउकाय के हजार भव कीडे के हजार भव हजार भव अबर के हजार भव गधे के हजार भव वायुकाय के हजार भव कृमि के हजार भव हजार भव शियाल के हजार भव सर्प के हजार भव वनस्पतिकाय के हजार भव पतगिये के हजार भव गधे के 1 हजार भव खच्चर के | हजार भव घोडे के हजार भव हाथी के कीए / यह सभी भवोमें शस्त्रघात से महाव्यथा भोगकर मृत्यु पाता है ऐसे हजारो भवो के पश्चात वह जीव वसंतपुर नगरमें कोट्याधिपति वसुढतके घर उत्पन्न हुआ और गर्भमें आते ही सर्व द्रव्यों का नाश हुआ / जन्म होते ही पिताकी मृत्यु हुई। पांच साल के पश्चात माता की भी मृत्यु हुई, जिससे गाँव के लोगों ने उसका नाम निष्पुण्यक रखा / सभी जगहोंसे तिरस्कृत होता हुआ वह युवान हुआ और भाग्यकी अजमाईश के लिए परदेशगमन कीया / बिच समंदर जहाज डुबने के पश्चात निष्पुण्यक लकडे के सहारे किनारे पर आया और जहां भी गया वहां कुत्ते की तरह हडधुत हुआ। एक बार जंगलमें भटकते-भटकते महाज्ञानी गुरुमहाराज का योग हुआ। जिन्हें अपना दुःखित जिवन वृतांत कहा / ज्ञानी गुरुमहात्मानेज्ञानसे उसके पर्वभवोंको देखा और सारी बातें बताई। देवदळ्यकी बकाई राशीनहीं अदा करनेका यह फल है यह समजने के पच्यात निष्पुण्यक ने गुरुमहाराज से देवद्रव्य के भक्षण का प्रायश्चित मांगा / गुरुभगवंत ने अधिक देवद्रव्यकी भरपाई-रक्षण और वृद्धि इत्यादी के द्वारा दुष्कर्म नाश होने कासमजाया, तभी निष्पुण्यक नियम करता है की.... एक हजारगुनी देवद्रव्यकी बकाया राशी जब तक जमा न करवाउं तब तक एक जोड़ वस्त्र और रोजके आहार से ज्यादा कुछभी द्रव्य उपने पास नहीं रखेगा।धीर धीर सभी बकाया देवव्यकी राशी भरपाई करके अनृणी हुआ और अपने स्वद्रव्यसे भव्य जिनालय बनवाकर अखंड जिनभक्ति करते-करते तीर्थकर नामकर्म की उपार्जना करके दिक्षा लेकर संयम की अपूर्व आराधना करते हुए देवलोक में उत्पन्न हआ और उसके पश्चात महाविदेह क्षेत्रमें तीर्थकर बनकर सिद्ध गति प्राप्त की। देवव्य किवकाया राशी भरनी वाकी है तो आप भी देवदव्य के भक्षक वन सकते है / जिनालय में जलते दिये के प्रकाश में अपना पत्र पढनेवाले को तिर्यंच का भव लेना पड़ा उसी तरह देवदव्य के वहीवट के द्वारा डायरेक्ट या इनडायरेक्ट तरीकेसे व्यक्तिगत लाभ लिया गया था उसका उपयोग शास्त्रोनसार नहीं किया गयायादेवद्रव्य की वकाया राशी वसलात और उपयोग मे उपेक्षा हुई तो दुर्गती की परंपरा सुनिश्चित है।। देवद्रव्य क्या है ? उसमें कोनसे द्रव्यो का समावेश होता है ? परमात्माको समर्पण किया हुआ द्रव्य : देवद्रव्य * भंडारमें रखा हुआ द्रव्य : देवद्रव्य * अष्टप्रकारी जिनपुजा के चडावें/बोली का द्रव्य : देवद्रव्य अंजनशलाका, प्रतिष्ठा के चढावे का द्रव्य : देवद्रव्य * परमात्माकी रथयात्रा के सभी चडावें/बोली का द्रव्य : देवद्रव्य संघमाळ, उपधानकी मालाका द्रव्य : देवद्रव्य महापूजा-महाआंगी इत्यादी सभी के निर्माल्यका द्रव्य : देवद्रव्य पर्युषणा महापर्वक स्वप्नके चढावे का द्रव्य : देवद्रव्य *आरतीमें रखा हुआ और आरती के चडावें/बोली का द्रव्य : देवद्रव्य परमात्माकी भक्ति से दिया हुआ द्रव्य : देवद्रव्य देवद्रव्यका उपयोग पुराने जिनमंदिरोका जिर्णोद्वार और नये जिनमंदिर जिनबिंबके निर्माण आदि के अलावा करने से देवद्रव्य नाश/ भक्षण का भयंकर दोष लग सकता है / देवदव्यके सयोग्य आज्ञा अनुसार वहीवटके लाभ देवद्रव्यकी अपनी मरजी अनुसार वहीवटके गेरलाभ - धंधे में बांधे हुए पापो को धोने का अवसर परमात्माकी आज्ञा का भंग संघका और दाताका विश्वासघात -बुद्धि-प्रज्ञा और जानकारीका सदुपयोग - विराधना - मिथ्यात्व आदि के महादोष अनेक गुरुभगवंतो का परिचय जुठी परंपरा चालु होती है - अनेक संघो-तीर्थोकी मुलाकात - दर्शन का लाभ लोकमें निंदा, प्रतिष्ठा खंडित होना तीर्थकर नामकर्म बंध द्वारा आत्मशुद्धि राजकीय कार्यवाहीमें नुकशान होना पुण्यकी समाप्ती आत्मविकास अटकजाना प्रभावना-रक्षा-आराधना के प्रसंगमें जवाबदारी पूर्वक का योगदान सीदाते हुऐ क्षेत्र ज्यादा सीदाए द्रव्यों के सुयोग्य दान की भावना उत्पन्न करने का लाभ भवांतरमें जैन धर्मकी प्राप्ति दुर्लभ होना सद्गति और मुक्ति सुनिश्चित दुर्गति एवं संसार परिभ्रमण सुनिश्चित जिनशासनाकीसथावरमुडी सेतिवद्रव्यतापक्षणायालपक्षाजानबूजलशयामनाजानीधीहोतीधार्यकपरिणामाइसीधमत्यापरभावी आवश्यधुवतबीपडतेहि। संघके आराधक-दाताओंको नम्र अपील..... श्री संघके द्रव्य के वहीवटकर्ताओंको नम अपील... जिनभक्ति सबंधी, स्वप्नकी उछामणी या रथयात्रा अपने पंधेिकी बकाया राशी की वसुलात में विलय ज्यादा इत्यादीके चढावे की बकाया राशी बाकी तो नहीं है ना...77 नकशान नहीं करेगा.. जबकी धर्मद्रव्यकी बकाया अगर बाकी है तो जल्द से जल्द भर विजिए। शास्त्रा कहतहका राशी की बसुलातमें विलंब आपतिकी परंपरा सजती है कर्मसत्ता को आपका एड्रेसढुंढनेमें जराभी देर नहीं लगेगी... (श्री गणमान्य निकामोह, यह पहकी फ्री लेमीनेट कोपी के लिए संपर्क करें : संजयभाई 098690401047022-28826461, विरेनभाई 09322232391, धर्मेशभाई : 09320284827
SR No.249695
Book TitleDev Dravya Highest Sin
Original Sutra AuthorN/A
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Publication Year
Total Pages2
LanguageGujarati
ClassificationArticle
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