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________________ 10 जनवरी 2011 जिनवाणी 401 परमार्थ-निन्दा इन दोनों को प्राप्त होता है। " 'इस प्रकार साधु को केवल आर्याजनों के संसर्ग से ही दूर नहीं रहना चाहिए, किन्तु अन्य भी जो-जो वस्तु साधु को परतन्त्र करती है उस उस वस्तु का त्याग करने हेतु तत्पर रहना चाहिए। उसके त्याग से उसका संयम दृढ़ होगा। क्योंकि बाह्य वस्तु के निमित्त से होने वाला असंयम उस वस्तु के त्याग से ही सम्भव होता है । " आर्यिकाओं के गणधर आर्यिकाओं की दीक्षा, शंका-समाधान, शास्त्राध्ययन आदि कार्यों के लिए श्रमणों के सम्पर्क में आना भी आवश्यक होता है। श्रमण संघ की व्यवस्था के अनुसार साधारण श्रमणों की अकेले आर्यिकाओं से बातचीत आदि का निषेध है । आर्यिकाओं को प्रतिक्रमण, स्वाध्याय आदि विधि सम्पन्न कराने के लिए गणधर मुनि की व्यवस्था का विधान है। आर्यिकाओं के गणधर ( आचार्य आदि विशेष) को निम्नलिखित गुणों से सम्पन्न माना गया है। प्रियधर्मा, दृढ़धर्मा, संविग्नी (धर्म और धर्मफल में अतिशय उत्साह वाला), अवद्य (पाप) भीरू, परिशुद्ध (शुद्ध आचरण वाले), संग्रह ( दीक्षा, उपदेश आदि द्वारा शिष्यों के ग्रहण-संग्रह) और अनुग्रह में कुशल, सतत सारक्षण (पापक्रियाओं से सर्वथा निवृत्ति) से युक्त, गंभीर दुर्द्धर्ष (स्थिर चित्त एवं निर्भय अन्तःकरण युक्त), मितभाषी, अल्पकौतुकयुक्त, चिरप्रवर्जित और गृहीतार्थ ( तत्त्वों के ज्ञाता) आदि गुणों से युक्त गणधर (आचार्य) आर्यिकाओं के मर्यादा उपदेशक होते हैं। 8 इन गुणों से युक्त श्रमण तो अपने आप में पूर्णत्व को प्राप्त करने वाला होता है और यह तो श्रमणत्व की कसौटी भी है। ऐसे ही गणधर आर्यिकाओं को आदर्श रूप में प्रतिक्रमणादि विधि सम्पन्न करा सकते हैं । उपर्युक्त गुणों से रहित श्रमण यदि गणधरत्व धारण करके आर्यिकाओं को प्रतिक्रमण कराता एवं प्रायश्चित्तादि देता है तब उसके गणपोषण, आत्मसंस्कार, संल्लेखना और उत्तमार्थ - इन चार कालों की विराधना होती है । अथवा छेद, मूल, परिहार और पारंचिक- ये चार प्रायश्चित लेने पड़ते हैं। साथ ही ऋषिकुल रूप गच्छ या संघ, कुल, श्रावक एवं मिथ्यादृष्टि आदि इन सबकी विराधना हो जाती है। अर्थात् गुणशून्य आचार्य यदि आर्यिकाओं का पोषण करते हैं तो व्यवस्था बिगड़ जाने से संघ के साधु उनकी आज्ञा पालन नहीं करेंगे। इससे संघ और उसका अनुशासन बिगड़ता है। इस प्रकार श्रमणसंघ के अन्तर्गत आर्यिकाओं की विशिष्ट आचार पद्धति और उसकी महत्ता का यहाँ प्रतिपादन किया गया, शेष नियमोपनियम श्रमणों जैसे ही हैं। सन्दर्भ: - 1. मूलाचार सवृत्ति, 4. 187 2. ण विणा वट्टदि णारी एक्कं वा तेसु जीवलोयम्हि । ण हि संउडं च गत्तं तम्हा तासिं च संवरणं । प्रवचनसार, 225.5 3. स्त्रीणामपि मुक्तिर्न भवति महाव्रताभावात् । - मोक्खपाहुड टीका, 12 Jain Educationa International For Personal and Private Use Only www.jainelibrary.org
SR No.230000
Book TitleAryikao ki Achar Paddhati
Original Sutra AuthorN/A
AuthorFulchandra Jain Shatri
PublisherZ_Jinvani_Guru_Garima_evam_Shraman_Jivan_Visheshank_003844.pdf
Publication Year2011
Total Pages10
LanguageHindi
ClassificationArticle & 0_not_categorized
File Size2 MB
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