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________________ ज्ञानयोग : भक्तियोग : कर्मयोग ] [ 163 भक्त के लिए आनुषंगिक और अनिवाय उपलब्धि है-उसके लिए वह ज्ञानमार्गियों की तरह भ्रम नहीं करता / वह तो सर्वात्मना आराध्य के प्रति समर्पित हो जाता है और आराध्य कृपा करके वह स्वयं रसे उपलब्ध हो जाता है। वह मानता है कि जिसे माना है उसी में अपने को डुबो दो, लीन कर दो-समर्पित कर दो / उसे साधन से नहीं पाया जा सकता, हाँ वह स्वयं ही साधन बन जाय और अपने को उपलब्ध करा देयह संभव है। भक्ति वह तत्त्व है जो की नहीं जाती 'जैहि पै बनि आवै'-हो जाती है--जिससे बन गई, बन गई अन्यथा प्रयत्न करते रहो-निष्फल / गजराज सुरसरि की विपरीत धार में बह जाता है-लाख प्रयत्न के बावजूकजबकि मछली निष्प्रयास तर जाती है। ज्ञान से 'स्वरूप का बोध हो जाता है, भक्ति से ‘स्वरूप' बोध के बाद कल्पित भेद की भूमि पर रस क्रीड़ा चलती रहती है / भक्ति कर्म नहीं है, भाव है, जो स्वरूप-साक्षात्कार के अनन्तर अमर होती है। जब तक स्वरूप साक्षात्कार नहीं है, तब तक अविद्या का साम्राज्य है। अविद्या से अहंकार का प्रादुर्भाव होता है और 'अहंकार विमूढ़ात्मार्कताsहमिति मन्यते'- अहंकार-ग्रस्त व्यक्ति स्वयं को कर्ता मानता है यह अविद्याजनित-अहंकार-मूलक-कर्तृत्व बोध जब तक रहेगा, तब तक जो कुछ भी होगावह कर्तृत्व-सापेक्ष होने से 'कर्म' ही कहा जायगा-'भक्ति' नहीं। फलतः वास्तविक भाव राज्य का उदय अविद्या निवृत्ति एवं स्वरूप-साक्षात्कार के बाद होता है। यही 'भाव' प्रगाढ़ होकर 'प्रेम' बनता है-'भावः स एव सान्द्वत्मा बुधै प्रेमा निगधते' यह सब कुछ चित्त की एकतानता से संभव है-जो तब तक संभव नहीं है जब तक मलात्मक आवरण जीर्ण न हो / मलशान्ति के निमित्त निष्काम भाव से कर्म का सम्पादन अपेक्षित है। बात यह ह कि 'कर्म' का त्याग तो सर्वात्मना संभव है नहीं / जहाँ मरना, जीना, सांस लेना और छोड़ना भी 'कर्म' है-वहां कर्म का स्वरूपतः त्याग तो संभव नहीं / सच्चा कर्मत्याग फलासक्ति का त्याग है। कर्म रूपी बिच्छू का डंक है-आसक्ति / इसी के कारण आवरणों का होना संभव होता है। फलतः इसी आसक्ति का त्याग होने से कर्म अकर्म हो जाते हैं-उनसे आवरणों का पाना बंद हो जाता है-शेष को ज्ञानाग्नि भस्मसात् कर देती है। अनासक्त कर्म बंधन नहीं, मुक्ति का साधन बन जाता है-कर्म योग बन जाता है। गीताकार ने सवाल खड़ा किया कि स्वभाव में प्रतिष्ठित हो जाने के बाद कर्म छोड़ देना चाहिये या करना चाहिए ? भगवान् कृष्ण ने सिद्धान्त रूप में कहा कि लोक संग्रह के लिए स्वरूपोपलब्धि के बाद भी कर्म करना चाहिए। इस प्रकार स्वरूप साक्षात्कार से पूर्व मलापहार के निमित्त अनासक्त भाव से और स्वरूप साक्षात्कार के बाद लोक संग्रह के निमित्त कर्म करते रहना चाहिए। संक्षेप में यही ज्ञान योग, भक्ति योग और कर्मयोग का आशय है। Jain Educationa International For Personal and Private Use Only www.jainelibrary.org
SR No.229870
Book TitleGyanyog Bhaktiyog aur Karmyog
Original Sutra AuthorN/A
AuthorRammurti Tripathi
PublisherZ_Jinvani_Karmsiddhant_Visheshank_003842.pdf
Publication Year1984
Total Pages2
LanguageHindi
ClassificationArticle & 0_not_categorized
File Size609 KB
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