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________________ 15.17 नवम्बर 2006 जिनवाणी 195 कुंथु अरं च मल्लिं वंदे, मुणिसुव्वयं नमिजिणं च। वंदामि रिट्ठनेमि, पासं तह वद्धमाणं च ।।४।। एवं मए अभियुआ, विहूयरयमला पहीणजरमरणा। चउवी संपि जिणवरा, तित्थयरा मे पसीयंतु ।।५।। कित्तिय-वंदिय-महिया, जे ए लोगस्स उत्तमा सिद्धा। आरुग्ग-बोहिलाभं, समाहिवरमुत्तमं दिंतु ।।६।। चंदेसु निम्मलयरा, आइच्चेसु अहियं पयासयरा। सागरवर-गंभीरा, सिद्धा सिद्धिं मम दिसंतु।।७।। (By uttering the above lesson we offer our worship to Twenty Four Tirthankar Gods. By constant chanting of the Lord's names, our evils are destroyed and it purifies the mind. A pure mind only can receive virtues.) (लोगस्स के उपर्युक्त पाठ द्वारा चौबीसों तीर्थंकरों की स्तुति की जाती है। बार-बार प्रभु का नाम स्मरण करने से हमारे कर्म क्षय होते हैं व आत्मा निर्मल होती है। निर्मल आत्मा ही सद्गुणों को ग्रहण करती चतुर्विंशतिस्तव का मनोयोग पूर्वक गाथा छन्द में भावसहित उच्चारण करते हुए रोम-रोम का पुलकित होना उत्कृष्ट कर्म-निर्जरा का हेतु बनता है। प्रत्येक गाथा तीर्थंकरों की विशेषताओं को प्रकट करने वाली है। प्रथम गाथा में तीर्थंकरों के चार अतिशयों का वर्णन किया गया है। लोगस्स उज्जोयगरे- लोक में उद्योत करने वाले अर्थात् इस विषय-वासना से पूरित संसार में वीतराग वाणी का उद्योत करने वाले तीर्थंकर भगवन्त प्रकाश पुंज के समान हैं। धम्मतित्थयरे- धर्म तीर्थ की स्थापना करने वाले अर्थात् तीर्थंकर जब चार धर्मतीर्थों अर्थात् साधु, साध्वी, श्रावक व श्राविका रूप तीर्थ का प्रवर्तन करते हैं तभी से तीर्थंकर संज्ञा से उपमित होते हैं। जिणे- जीतने वाले। अर्थात् जयतीति जिनः। जिन्होंने स्वरूपोलब्धि में बाधक राग, द्वेष, मोह, काम, क्रोध आदि भाव कर्मो को तथा ज्ञानावरणीयादि द्रव्यकर्मों को जीत लिया है, वे जिन होते हैं! अरिहन्ते- अरिहन्त अर्थात् अरि+हन्त =आन्तरिक शत्रुओं के नाशक, जिनके अन्दर केवलज्ञान रूपी अलौकिक सूर्य प्रकाशमान है। प्रथम गाथा में तीर्थंकरों के इन चार अतिशयों का वर्णन करते हुए उनकी स्तुति करने के लिए साधक प्रतिज्ञाबद्ध होता है। दूसरी से चौथी गाथा में वर्तमान अवसर्पिणी काल के चौबीस तीर्थंकरों का नाम सहित गुण वर्णन किया गया है। इसमें यह विशेषता है कि प्रत्येक तीर्थंकर का नाम उनके जीवन से संबंधित घटना विशेष के आधार पर अथवा विशेष अर्थ रूप में वर्णित है। नौवें तीर्थंकर के दो नाम श्री सुविधिनाथ जी तथा पुष्पदंत जी इसमें प्रयुक्त हुए हैं। १९वें तीर्थंकर श्री मल्लीनाथ जी स्त्री पर्याय में हुए। ये तीन गाथाएँ अशाश्वत होती हैं। क्योंकि जिस काल में जो चौबीसी होती है, उसी के अनुसार इनकी रचना मानी गई है। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.229769
Book TitleUtkirtan Sutra Ek Vivechan
Original Sutra AuthorN/A
AuthorPremchand Jain
PublisherZ_Jinavani_002748.pdf
Publication Year2006
Total Pages5
LanguageHindi
ClassificationArticle & 0_not_categorized
File Size96 KB
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