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________________ [10 ||15,17 नवम्बर 2006|| | जिनवाणी देवसिय' इच्चाइदंडगेण सयलाइयारमिच्छामिदुक्कडं दाउं, उठ्ठिय सामाइयसुत्तं भणित्तु, 'इच्छामि ठाइउं काउसग्ग' मिच्चाइसुत्तं भणिय, पलंबियभुयकुप्परधरिय नाभि अहो जाणुड्ढे चउरंगुलठवियकडियपट्टो संजइकविठ्ठाइदोसरहियं काउस्सगं काउं, जहक्कम दिणकए अइयारे हियए धरिय, नमोक्कारेण पारिय, चवीसत्थयं पढिय, संडासगे पमज्जिय, उवविसिय, अलग्गविययबाहुजुओ मुहणंतए पंचवीसं पडिलेहणाओ काउं, काए वि तत्तियाओ चेव कुणइ। साविया पुण पट्टिसिर-हिययवज्जं पन्नरस कुणइ। उठ्ठिय बत्तीसदोसरहियं पणवीसावस्सयसुद्धं किइकम्मं काउं अवणयंगो करजुयविहिधरियपुत्ती देवसियाइयाराणं गुरुपुरओ वियऽणत्थं आलोयणदंडगं पढइ। तओ पुत्तीए कट्ठासणं पाउंछणं वा पडिलेहिय वामं जाणुं हिट्ठा दाहिणं च उड्ढं काउं, करजुयगहियपुत्ती सम्म पडिकमणसुत्तं भणइ। तओ दव्वभावुट्ठिओ ‘अब्भुट्टिओमि' इच्चाइदंडगं पढित्ता, वंदण दाउं, पणगाइसु जइसु तिन्नि खामित्ता, सामन्नसाहूसु पुण ठवणायरिएण समं खामणं काउं, तओ तिन्नि साहू खामित्ता, पुणो किइकम्म काउं, उद्धडिओ सिरकयंजली 'आयरियउवज्झाए' इच्चाइगाहातिगं पढित्ता सामाइयसुत्तं उस्सगदंडयं च भणिय, काउस्सगे चारित्ताइयारसुद्धिनिमित्तं, उज्जोयदुगं चिंतेइ। तओ गुरुणा पारिए पारित्ता, सम्मत्तसुद्धिहेउं उज्जोयं पढिय, सव्वलोयअरिहंतचेइयाराहणुस्सग्गं काउं, उज्जोयं चिंतिय सुयसोहिनिमित्तं 'पुक्खरवरदीवड्ढ' कड्ढिय, पुणो पणवीसुस्सासं काउस्सग्गं काउं पारिय, सिद्धित्थवं पढित्ता, सुयदेवयाए काउस्सग्गे नमुक्कारं चिंत्तिय, तीसे थुई देइ सुणेइ वा! एवं खित्तदेवयाए वि काउस्सग्गे नमुक्कारं चिंतिऊण, पारिय, तत्थुई दाउं सोउं वा पंचमंगलं पढिय संडासए पमज्जिय, उवविसिय, पुव्वं व पुत्तिं पेहिय, वंदणं दाउं 'इच्छामो अणुसिट्ठिं ति भणिय, जाणूहि ठाउं वद्धमाणंक्खरस्सरा तिन्निथुई उ पढिय, सक्कत्थय थुत्तं च भणिय, आयरियाई वंदिय, पायच्छित्त-विसोहणत्थं काउस्सग्गं काउं उज्जोय चउक्कं चिंतेइ त्ति। १. दैवसिकप्रतिक्रमण विधि ___ सर्वप्रथम श्रावक, गुरु महाराज के साथ अथवा अकेला ही 'जावंतिचेइयाई' और 'जावंतकेविसाहू' सूत्र एवं 'स्तुति प्रणिधान सूत्र" को छोड़कर चैत्यादि का वंदन करता है। फिर चार बार 'खमासमणसूत्र' पूर्वक आचार्य-उपाध्याय-वर्तमान साधु आदि को वन्दन करता है, फिर भूमितल पर मस्तक रखकर 'सव्वस्सवि देवसिय सूत्र के उच्चारण पूर्वक सकल अतिचारों का मिच्छामि दुक्कडं देता है। प्रथम सामायिक एवं द्वितीय चतुर्विंशतिस्तव आवश्यक- उसके बाद प्रतिक्रमण करने वाला साधक खड़े होकर सामायिक सूत्र बोलता है, फिर 'इच्छामि ठामि काउस्सग्ग" इत्यादि सूत्र को कहकर कायोत्सर्ग करता है। कायोत्सर्ग के समय दोनों भुजाओं को लम्बी कर, कोहनियों से कटिवस्त्र-चोलपट्टा या धोती को पकड़कर रख सके उस प्रकार से नाभि से चार अंगुल नीचे और घुटनों से चार अंगुल ऊपर कटिवस्त्र धारण करता है। कायोत्सर्ग संयति-कपिष्ठ आदि १९ दोषों से रहित होकर करना चाहिए। इस कायोत्सर्ग में दिनकृत्त अतिचारों को हृदय में धारण (याद) करता है। उसके बाद ‘णमो अरिहंताणं' शब्दपूर्वक कायोत्सर्ग पूर्ण कर Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.229758
Book TitleKhartar Gaccha aur Tapagaccha me Pratikraman Sutra ki Parampara
Original Sutra AuthorN/A
AuthorManmal Kudal
PublisherZ_Jinavani_002748.pdf
Publication Year2006
Total Pages12
LanguageHindi
ClassificationArticle & 0_not_categorized
File Size132 KB
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