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रचनामाथी लीधा होई शके.)
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आर्य समुद्राचार्यने नामे जे पद्य उध्धृत थयेलुं छे ते पण शैली अने वस्तुनी दृष्टिए मध्यकालीन छे. इस्वीसनना आरंभकाळे थई गयेला 'आर्य समुद्र' साथै एने कई लेवा देवा नथी. ए समये 'सूरिमन्त्र' सरखां चैत्यवासी जमानाना वस्तु-विभावोनुं अस्तित्व होवानुं क्यांयथीये प्रमाण नथीः अने ए काळे मुनिओ प्रतिमा - प्रतिष्ठा करावता नहीं; इस्वीसननी पांचमी शती सुधी प्राप्त थता प्रतिमा - लेखो ए वातनी साक्षी पूरे छे. मारा मते प्रस्तुत समुद्राचार्य दशमा शतकमां थई गयेला समुद्राचार्यथी अभिन्न होवा घटे; जे समुद्राचार्ये वायट गच्छना आदिम जीवदेव सूरिना जिन-स्नात्र - विधि ( प्राय: इस्वी नवम शतक) नामक प्राकृतमां निबध्ध लघु ग्रन्थ पर इ. स. ९५०मां धोळकामां संस्कृत वृत्ति वा पंजिका रची छे ते ज आ कहेवाता 'आर्य' समुद्र जणाय छे. सम्बन्धकर्ता पद्य आ मध्यकालीन (चैत्यवासी) समुद्राचार्यनी कोइ अन्य सगोत्री रचना - प्रतिष्ठा सम्बध्ध कोइ प्राकृत ग्रन्थमाथी लेवायेलुं लागे छे. पादलिप्स सूरिनी निर्वाणकलिका (प्राय: इस्वी ९७५) मां ते ( पाठांतर धरावता पाठ साथे) उध्धृत थयुं छे ते घटना रसप्रद छे; पण ध्यानमा राखवा जेवी बाबत ए छे के पादलिप्स सूरि 'त्रण' थयां छे. एमनां जीवनो संबंधी हकीकतो- घटनामां प्रभावकचरित (इ.स. १२७७) मां ज नहीं पण तेना पूर्वे रचाई गयेली भद्रेश्वर सूरिनी प्राकृत रचना कहावलि (प्राय: इ.स. १०००) मां पण नामसाम्यने कारणे भेळवी देवामां आवी छे. आदि पादलिस सूरि आर्य नागहस्ति ( प्राय: इस्वी १५०-२०० ) ना शिष्य हता. प्रतिष्ठानना सातवाहन राजा 'हाल' (के कण्ह) नी सभामां तेमनां बेसणां हतां; अने पाटलिपुत्रना विदेशी शक- मुरुण्ड नी शासकनी शिरोवेदना तेमणे दूर करेली एवी नोंध पण छठ्ठा - सातमा सैकाना भाष्य - चूर्ण्यादि साहित्यमां उपस्थित छे. तेमणे सुप्रसिद्ध तरंगवईकहा अने खगोळना कालज्ञान संबंधी ग्रन्थ ज्योतिष करण्डकनी रचना करेली. तेओए सौराष्ट्र तरफ विहार कर्यो जणातो नथी. (बहु तो भृगुकच्छ सुधी गया होय). द्वितीय पादलित सूरि वलभीना मैत्रक महाराज्यना आथमता युगमां थई गयेला. तेओ मंत्रसिध्ध अने धातुवाद- निष्णात, किमियागर, हता; स्पष्टतया चैत्यवासी हता. एमणे 'गाहाजुयलेण' शब्दोथी आरंभाता सुवर्णसिद्धि युक्त मनाता लघुस्तवनी रचना करेली, जे उपलब्ध छे. तेओ चरित - कथित ढांक बाजुना धातुविद् या रससिध्ध नागार्जुनना गुरु-मित्र हता.
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