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________________ १३८ अनुसन्धान-५९ ४. सन्मतिटीकाकार श्रीअभयदेवसूरिजीओ दिवाकरजीना मन्तव्यने युग पद्वादथी जुदुं पाडवा 'अभेदवाद' अq नाम आप्युं छे. आ रीते श्रीसिद्धसेनाचार्य अभेदवादी छे. परन्तु वि.भाष्य के विशेष-णवतिमां वर्णित अभेदवाद तो तेओने मान्य नथी ज; ओ अभेदवाद तो केवलदर्शन मानवानो ज निषेध करे छे अथवा तेनुं केवलज्ञान साथे सर्वथा औक्य स्वीकारे छे. ज्यारे सिद्धसेनाचार्य बन्नेने अक ज बोधनी अन्तर्गत गणी बन्नेने कथञ्चिद् अभिन्न गणे छे. फरी वार, श्रीअभयदेवसूरिजीओ दिवाकरजीना मन्तव्य करीके जणावेलो भेदाभेदात्मक 'अभेदवाद' अने वि.ण.मां वर्णित त्रण मुख्य वादोमांनो दर्शनसमुच्छेदात्मक 'अभेदवाद' बन्ने एक नथी. ५. केवलज्ञान अने केवलदर्शनमां औकान्तिक भेद के अभेद मानवामां अनेक दोषो छे. पण दिवाकरजीओ दर्शावेली रीते जो बन्ने वच्चे भेदाभेद स्वीकारीओ तो सर्वथा सङ्गति सर्जाय छे. 'स्याद्वादो विजयतेतराम्'. वळी, सामान्यग्राहक केवलदर्शन अने विशेषग्राहक केवलज्ञानने पोतानामा समावी लेनारो ओक केवलबोध ज परिपूर्ण वस्तुनो ग्राहक बनी शके छे, स्वतन्त्र बे उपयोगो नहीं. अने आ रीते बेने ओक ज उपयोगमा समाविष्ट करी दइओ तो 'जुगवं दो नत्थि उवओगा' ओ शास्त्रवचननी असङ्गति पण दिवाकरजीना मतमां नथी रहेती. वास्तवमां दिवाकरजी- मन्तव्य केवलचर्चामां अन्तिमबिन्दु गणी शकाय तेटलुं तर्कपूत छे. श्रीसिद्धसेन दिवाकरजीना केवलबोध अंगेना मन्तव्य विशे केटलांक नवां ज दृष्टिबिन्दुओ अत्रे रजू कर्यां छे, ते बधां साचां ज छे ओवो आ लखनारनो दावो नथी. ओक अल्पज्ञ जीवनो ओवो दावो होई शके पण नहीं. प्रचलित मान्यता करतां श्रीसिद्धसेनाचार्य- मन्तव्य भिन्न होवानी दृढ प्रतीति तेमज शास्त्रबल अने तर्कबल बन्ने रीते निर्बल अभेदवादने, दिवाकरजीना माथे थापी देवामां, तेमने अन्याय थतो होवानी समजणे ऊहापोह करवा प्रेर्यो छे. बहुश्रुत भगवन्तोने नम्र विनन्ति के आ विचारधारामां जो क्षति जणाय तो अवश्य सुधारे तथा सूचवे.
SR No.229675
Book TitleSiddhasen Divakarjina Kevalgyan Darshan Angena Mantavya Vishe Vicharna
Original Sutra AuthorN/A
AuthorTrailokyamandanvijay
PublisherZZ_Anusandhan
Publication Year
Total Pages38
LanguageHindi
ClassificationArticle & 0_not_categorized
File Size165 KB
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