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________________ अनुसन्धान-५७ वली गोतेंम गोत्री बहुने तंम्ये रे कीधां आप समां जीनराज जो, ईत्यादीक सरवे तुम तंणो रे कंम मोक्षे मोकल्य माहराज जो. ॥५॥ सी सुव्रत..... स्व(स्वा)मी हु स्या माटे वीसरो रे पीत पुराणी मंने घणी आस जो, प्रभु ताहर(रा) करी आपो मंने रे तमारा चरणकमळ नीवास जो. ॥६॥ सी सुव्रत..... ओम भवोभव मजने आपीओ रे कांईक बोधबीजनो लाभ जो । तीहा सेठ बलुभाई अमे कहे रे पछे आपो मोक्ष सुखना राज जो ॥७|| सी सुव्रत..... रंगविजयकृत (३) हरियाळी (महावीर जिनेसर उपदिसे - ओ देशी) अकपुरुष नवलो तुमे सांभलज्यो नरनारी रे सुणतां कौतुक उपजें, कहिज्यों अरथ विचारी रे ॥१॥ सांभलजो वात विनोदनी. रात दिवस ऊभो रहें, न गणें धुप में वरषा रे उपसम रसमां झीलतो, सत्रु मित्रु सम सरखा रे. ॥२॥ सांभलजो० अष्टोत्तर सत्त नाम छे, निरनामी सहु जाणे रे, खलक मुलक खट दर्शने, ओ नरने नित्य वखाणे रे ॥३॥ सांभलजो० त्रिण काया दोय जीव छों, त्रिण मस्तक जस दीपें रे, रुपे मनमथ सूंदरु, तेजें तरणी जीपे रे ॥४॥ सांभलजो० वदन कमल ते पुरुषनां, अक सहस दोय मानें रे दोय सहस दोय जीभ छे, लीनो आतंम ध्यांने रे ॥५॥ सांभलजो० नेत्रानंदन नेत्र छे, दोय हजारने च्यार रे खट कर में पग च्यार छ, पूंछ ओक मन धार रे ॥६॥ सांभलजो० पूत्र अनंता छे तेहनें, नारी नहि वली कोई रे ब्रह्मचारी सिर सेहरो, वली परण्या नारी सोई रे ॥७॥ सांभलजो० हरीहर ब्रह्म पुरंदर, नमवा पद[पं]कज आवे रे
SR No.229618
Book TitleKetlik Futkal Krutio
Original Sutra AuthorN/A
AuthorRasila Kadia
PublisherZZ_Anusandhan
Publication Year
Total Pages7
LanguageHindi
ClassificationArticle & 0_not_categorized
File Size59 KB
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