SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 4
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ 1863 श्रीराजसागरशिष्यपण्डितसुरविसागरनामतः । श्रीनाभिभूपतिवंशदिनपतिवृषभजिनपतिरीहितं कुरुतान्मतो जिनसागरस्य च नाकिनायकसन्मतः ।। ४. नेमिसागर-कृत (वीरजिन-स्तोत्र) (सुखाशिका-नाम-गर्भित) जयसि साकर मोदक हेशसी सुकृतवृक्षजले बिभयक्षयः । क्षितजरामर कीर्तिभर क्षमो गलदधेवर मुक्तिरमाकरः ॥ १ दिशतु मेघरमां वर लापसी खलहलां स्फुरदाखगिरौ पवे । गुणबदामरिपुक्षयनिर्वृते रत बनालिअरम्यमुखाम्बुजम् ।। २ जन अखोडकपूरकरम्बकं सुजलदाडिमनोहरनिस्वनम् । प्रणम सेवकखांडमधीतिदं स्फुरदहीशनुतं नतखाजलम् ॥ ३ (फाग) जनपस्तांजन खारिक भेदक सार । कुहलापाकदमीदो सोपारीरससार ।। १ सत् सेवइआ मोती आ कसमसिआ सार । दुष्टकलाइआ गल पापडी जय जय कार ॥ २ मांडीनतमं तारय वसुधा मोतीचूर । महसूपकरणकारण कयरीपाक खजूर ॥ ३ मामवपुण्यवसुं हालीनत मंसु खसंग । चार्वा चारोली कर चार विजित मातंग ।। ४ वरसोला नतपदयुग पारगतं नमजांक । जितशोकाक बलीश्वर सुकृत सदाफललोक || ५ आंबा नारायण नतपदकज सेलडि सार ।। वृष बीजोरू केलां त्वामभिनौमि जितार ॥ ६ सालि सुदालि नतक्रम मांडा वडि जिनचन्द्र । जयसि सुखीरवडां जनकर मलहर गततन्द्र ॥ ७ सुंदर डोडीला धर पापड पापडी सार । तूरी आन्वितकंकोडा भततेस्तनु तार || ८ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.229425
Book TitleStutyatmaka Sat Laghu Krutio
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDhurandharvijay
PublisherZZ_Anusandhan
Publication Year
Total Pages6
LanguageHindi
ClassificationArticle & 0_not_categorized
File Size270 KB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy