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________________ सप्टेम्बर २००९ १०५ श्रीपासचंद्रसूरीसर इम जंपइ, नाम कही दीधो धुर एहनउ पंडित ... .... .... .... पंडित० ४ उकेल : भवितव्यता अथवा नियति आनो जवाब होई शके. कविए गीतमा क्यांक नाम सांकेतिक रूपे मूक्युं छे पण ते समजातुं नथी. चोथी कडीमां बे पंक्ति स्पष्ट वांची शकाई नथी. (२) नारी रे में दीठी एक आवती रे, जाती न देखे कोय रे; जे नर एहने आदरे रे, तेनैं सिवसुख होय रे, ना० १ [धर्मी]जन तणे मुखें रहे रे, पापी संग न जाय रे; धरमी जन पासें वसे रे, पद बत्रीस कहेवाय रे, ना० २ एक सो नवाणु बेटडा रे, मोटा चोवीस ईश रे; नानडीआ हवे सांभलो रे, सत पंच्योत्तर सीस रे, ना० ३ अढार लाख जूठा बेटडा रे, उपर चोवीस हजार रे; एक सो वीस मांहि मूंकीइं रे, तो पामिइं भवपार रे, ना० ४ आठ संपदाएं परवरी रे, नारी ....... सरूप रे; मुक्तिरमणी बहु मेलव्या रे, वडवडेरा भूप रे, ना०५ गौतमस्वामियें पूछीउं रे, उपदेशे श्री वर्धमान रे; एहथी अनंत जीव पामिया रे, खीण माहे केवलज्ञान रे, ना०६ साध-साधवी सहू आदरे रे, आदरे अरिहंत देव रे; मेघराज मुनि इम भणे रे, इनी करज्यो घणी सेव रे, ना० ७ इति श्री अरीआवही समस्या सज्झाय । - प्रकीर्ण पत्र उकेल : इरियावही. आमां 'आवहीं' उच्चार छे ते उपरथी 'आवती जोइ छे, पण जाती नथी जोई' एवी कल्पना कविए करी छे. १९१ बेटा = 'इरियावही' तथा 'तस्स उत्तरी' सूत्रना कुल अक्षर. मोटा दीकरा = गुरु अक्षर. नाना दीकरा = लघु अक्षर. Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.229409
Book TitlePanch Hariyali
Original Sutra AuthorN/A
AuthorBhuvanchandravijay
PublisherZZ_Anusandhan
Publication Year
Total Pages4
LanguageHindi
ClassificationArticle & 0_not_categorized
File Size249 KB
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