SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 4
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ अनुसन्धान ५२ ............... श्री....... एवं देवेन्द्रसंख्यैः कमल दल सुकाव्यैः । श्रीमच्छ्रीपार्श्वनाथः प्रकटतरयशा संस्तुतो वीतरागः । भूयाच्छ्रीरत्नसारक्रमणविहितदृग्रत्नहर्षप्रसत्त्या । .................. विकसुरमणिबोधिबीजस्य दाता ॥१७॥ ॥ इति चतुःषष्टिदलकमलबन्धस्तवं ॥ द्वात्रिंशद्दलकमलबन्धपार्श्वनाथ स्तव श्री पार्श्व जिनेश्वर प्रणमउ धरि उल्हास, अद्भुत दहदिसि जसु जसवास । माता जिम पूरइ पुत्र तणी सवि आस, सुप्रसन हुउ साहिब द्यउ मुझ लीलविलास ॥१॥ त......... .......... इं धन दिन धन ए मास, समतारस-पूरित मूरति पुण्यप्रकास । तरुणी-तरुणीगण देखि न पाम्यउ त्रास, तसु पाय नमं.. ............क नास ॥२॥ विषमा अरि जुडिया नही तिलभर अवकास, हिलि हिलि स्वर पूरयउ धरणीनइ आकास । ....षण ज.... ................. ण चित्ति विमास, जे वांका वयरी ते पिण थायइ दास ॥३॥ समरंतां नासइ रोग भगंदर खास, लहि[यउ]घरि ल .................. दर आवास । मेटइ दुःख दोहग दुरगति दुष्ट प्रवास, रूसइ नवि तूसइ जउ को करइ विणास ॥४॥ दस.................... रतर................... अभ्यास, यतिवर कमठासुर देखी थयउ उदास । सम घनन वरसाव्यउ आव्यउ जल आनास,
SR No.229388
Book TitleChatushasthi evam Dwatrinshad Dalkamalbandh Parshwanath Stava
Original Sutra AuthorN/A
AuthorVinaysagar
PublisherZZ_Anusandhan
Publication Year
Total Pages5
LanguageHindi
ClassificationArticle & 0_not_categorized
File Size55 KB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy