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श्रीसिद्धसेनसूरि रचित 'सिद्धमातृका' प्रकरणनी भूमिका
सं. विजयशीलचन्द्रसूरि मुनि धुरन्धरविजयजी
आचार्य श्रीसिद्धसेनसूरिजी कृत सिद्धमातृकाधर्मप्रकरणनी मूल कृति अहीं प्रस्तुत छे. आ कृति अर्थगम्भीर छतां प्रसन्न छे.
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'अ' थी प्रारंभीने 'क्ष' सुधीना वर्णोनी माळाने प्राचीन महापुरुषो सिद्धमातृका कहे छे. जगतनो समग्र व्यवहार भाषाथी ज चाले छे. अने ते भाषानी जननी आ सिद्धमातृका छे. सिद्धमातृका एटले अविनाशी एवी जगज्जननी अक्षरमातृका, जे क्यारे पण नाश पामती नथी.
आ सिद्धमातृकाना प्रारंभमां भले मींडी, च नमः सिद्धं अने अंतमां मङ्गलं महाश्रीः । आवतुं ॥ आ आकृतिने प्राचीन कालथी 'भले मिंडी' कहे छे. एने कुण्डलिनी रूपे आ रचनामां अने अन्यत्र पण आ प्रकारनी रचनामां वर्णवी छे. आ आकृति माटे 'भले' शब्द ज केम वपरायो
आम्नायना अभावना कारणे समजातुं नथी. पण अत्यन्त प्राचीनकाळथी आ रीते ज ओळखाय छे. आ शब्द परम मांगलिक छे. माटे वार्तालापना व्यवहारमां स्वीकारना अर्थमा आपणे खूब ज व्यापकताथी 'भले' शब्दनो उपयोग करीए छीए. सिद्धं शब्दनो उपयोग 'क्यां' ने बदले 'शीद' आ अपभ्रष्ट रूपे करीए छोए.
जैन तान्त्रिकोना मते अर्ह ए शब्दब्रह्म छे. तेमांथी कुण्डलिनी शक्तिनुं जागरण, तेमांथी अनादि संसिद्ध वर्णमातृकानुं प्रागट्य आ वैश्विक क्रम छे. आ रचनामां पूज्य आचार्यश्री 'अहं' 'भले मिंडी' 'ॐ नमः सिद्धं' पछी वर्णमाला आ क्रमथी ज रहस्य उपर प्रकाश पाथरे छे.
आ रचनाना १ थी ६२ सुधीना श्लोको अत्यन्त अर्थगम्भीर रहस्योथी भरेला छे. जेमां ग्रन्थकार 'अर्ह' 'भले मिंडी' अने 'ॐ नमः सिद्धं नुं
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