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________________ . जैन धर्म और दर्शन नौवें आदि तीन गुणस्थान में उपशमश्रेणिवाले औपशमिकसम्यक्त्वी को या क्षायिकसम्यक्त्वी को चारित्र औपशमिक माना है। आठवें गुणस्थानों में औपशमिक या क्षायिक किसी सम्यक्त्ववाले को औपशमिक चारित्र इष्ट नहीं है, किन्तु क्षायोपशमिक । इसका प्रमाण गाथा में 'अपूर्व शब्द का अलग ग्रहण करना है; क्योंकि यदि आठवें गुणस्थान में भी औपशामिकचारित्र इष्ट होता तो 'अपूर्व शब्द अलग ग्रहण न करके उपशमक शब्द से ही नौवें आदि गुणस्थान की तरह आठवे का भी • सूचन किया जाता । नौवें और दसवें गुणस्थान के क्षपकश्रेणि-गत-जीव-संबन्धी भावों का व चारित्र का उल्लेख टीका या टबे में नहीं है। पञ्चसंग्रह की टीका में श्री मलयगिरि ने 'उपशमक'-'उपशान्त पद से आठवें से ग्यारहवें तक उपशमश्रेणिवाले चार गुणस्थान और 'अपूर्व' तथा 'क्षीण' पद से आठवाँ, नौवों, दसवाँ और बारहवाँ, ये क्षपकश्रेणिवाले चार गुणस्थान ग्रहण किये हैं । उपशमश्रेणिवाले उक्त चारों गुणस्थान में उन्होंने औपशमिक चारित्र माना है, पर क्षपकश्रेणिवाले चारों गुणस्थान के चारित्र के संबन्ध में कुछ उल्लेख नहीं किया है। ग्यारहवें गणस्थान में संपूर्ण मोहनीय का उपशम हो जाने के कारण सिर्फ श्रौपशमिक चारित्र है, नौवें और दसवें गुणस्थान में औपशमिक-दायोपशमिक दो चारित्र हैं; क्योंकि इन दो गणस्थानों में चारित्र मोहनीय की कुछ प्रकृतियाँ उपशान्त होती हैं, सब नहीं। उपशान्त प्रकृतियों की अपेक्षा से औपशमिक और अनुपशान्त प्रकृतियों की अपेक्षा से क्षायोपशमिक-चारित्र समझना चाहिए । यह बात इस प्रकार स्पष्टता से नहीं कही गई है परन्तु पञ्च० द्वा० ३की २५वों गाथा की टीका देखने से इस विषय में कुछ भी संदेह नहीं रहता क्योंकि उसमें सूक्ष्मसंपराय-चारित्र को, जो दसवें गुणस्थान में ही होता है, क्षायोपशमिक कहा है। उपशमश्रेणिवाले आठवें, नौवें और दसवें गुणस्थान में चारित्र मोहनीय के उपशम का आरम्भ या कुछ प्रकृतियों का उपशम होने के कारण औपशमिक चारित्र, जैसे पञ्चसंग्रह टोका में माना गया है, वैसे ही क्षपकश्रेणिवाले आठवें आदि तीनों गुणस्थान में चारित्रमोहनीय के क्षय का प्रारम्भ या कुछ प्रकृतियों का क्षय होने के कारण क्षायिकचारित्र मानने में कोई विरोध नहीं दीख पड़ता। गोम्मटसार में उपशमश्रेणिवाले आठवें आदि चारों गुणस्थान में चारित्र औपशमिक ही माना है और क्षायोपशमिक का स्पष्ट निषेध किया है। इसी तरह क्षपकश्रेणिवाले चार गुणस्थान में क्षायिक चारित्र ही मानकर क्षायोपशमिक का Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.229069
Book TitleKuch Paribhashika Shabda
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSukhlal Sanghavi
PublisherZ_Darshan_aur_Chintan_Part_1_2_002661.pdf
Publication Year1957
Total Pages43
LanguageHindi
ClassificationArticle & Dictionary
File Size78 KB
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