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श्रावश्यक क्रिया
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: श्रावकों में 'आवश्यक' का प्रचार वैकल्पिक हैं। अर्थात् जो भावुक और नियमवाले होते हैं, वे अवश्य करते हैं और अन्य श्रावकों की प्रवृत्ति इस विषय में ऐच्छिक है । फिर भी यह देखा जाता है कि जो नित्य 'श्रावश्यक' नहीं करता, वह भी पक्ष के बाद, चतुर्मास के बाद या आखिरकार संवत्सर के बाद, उसको यथासम्भव अवश्य करता है । श्वेताम्बर - सम्प्रदाय में 'श्रावश्यक क्रिया' का इतना आदर है कि जो व्यक्ति अन्य किसी समय धर्मस्थान में न जाता हो, वह तथा छोटे-बड़े बालक-बालिकाएँ भी बहुधा साम्वत्सरिक पर्व के दिन धर्मस्थान में 'श्रावश्यक-क्रिया' करने के लिए एकत्र हो ही जाते हैं और उस क्रिया को करके सभी अपना अहोभाग्य समझते हैं। इस प्रवृत्ति से यह स्पष्ट है कि 'आवश्यक - क्रिया' का महत्त्व श्वेताम्बर- सम्प्रदाय में कितना अधिक है । इसी स से सभी लोग अपनी सन्तति को धार्मिक शिक्षा देते समय सबसे पहिले 'श्रावश्यकक्रिया' सिखाते हैं ।
जन-समुदाय की सादर प्रवृत्ति के कारण 'आवश्यक क्रिया' का जो महत्त्व प्रमाणित होता है, उसको ठीक-ठीक समझाने के लिए 'आवश्यक-क्रिया' किसे कहते हैं ? सामायिक आदि प्रत्येक 'आवश्यक' का क्या स्त्ररूप है ? उनके भेदक्रम की उपपत्ति क्या है ? 'आवश्यक - क्रिया' आध्यात्मिक क्यों है ? इत्यादि कुछ मुख्य प्रश्नों के ऊपर तथा उनके अन्तर्गत अन्य प्रश्नों के ऊपर इस जगह विचार करना आवश्यक है |
परन्तु इसके पहिले यहाँ एक बात बतला देना जरूरी है । और वह यह है कि 'आवश्यक-क्रिया' करने की जो विधि चूर्णि के जमाने से भी बहुत प्राचीन थी और जिसका उल्लेख श्रीहरिभद्रसूरि-जैसे प्रतिष्ठित आचार्य ने अपनी आव श्यक- वृत्ति पृ०, ७६० में किया है । वह विधि बहुत अंशों में अपरिवर्तित रूप से ज्यों की त्यों जैसी श्वेताम्बर मूर्त्तिपूजक-सम्प्रदाय में चली आती है, वैसी स्थानक - वासी सम्प्रदाय में नहीं है । यह बात तपागच्छ, खरतरगच्छ आदि गच्छों की सामाचारी देखने से स्पष्ट मालूम हो जाती है । स्थानकवासी - सम्प्रदाय की सामाचारी में जिस प्रकार 'श्रावश्यक क्रिया' में बोले जानेवाले कई प्राचीन सूत्रों की, जैसे:- पुक्खरवरदीवड्ढे, सिद्धाणं बुद्धाणं, अरिहंतचेइयाणं, आयरियउवज्झाए, प्रभुडियोsहं, इत्यादि की काट-छाँट कर दी गई है, इसी प्रकार उसमें प्राचीन विधि की भी काट-छाँट नजर आती है। इसके विपरीत तपागच्छ, खरतरगच्छ आदि की सामाचारी में 'आवश्यक' के प्राचीन सूत्र तथा परिवर्तन किया हुआ नजर नहीं आता । अर्थात् उसमें से लेकर यानी प्रतिक्रमण की स्थापना से लेकर 'प्रत्याख्यान' पर्यन्त के छहीं
प्राचीन विधि में कोई
'सामायिक - आवश्यक'
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