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________________ १३२ बतलाकर केवल बुद्ध में ही सिद्ध किया है। इस विचारसरणीमें शान्तरक्षितकी मुख्य युक्ति यह है कि चित्त स्वयं ही प्रभास्वर अतएव स्वभावसे प्रशाशील है । क्लेशावरण, ज्ञेयावरण श्रादि मल आगन्तुक हैं। नैरात्म्यदर्शन जो एक मात्र सत्यज्ञान है, उसके द्वारा श्रावरणोंका तय होकर भावनाबलसे अन्तमें स्थायी सर्वशताका लाभ होता है । ऐकान्तिक' क्षणिकत्वज्ञान, नैरात्म्य दर्शन आदिका अनेकान्तोपदेशी ऋषभ, वर्द्धमानादिमें तथा प्रात्मोपदेशक कपिलादिमें सम्भव नहीं श्रतएव उनमें आवरणक्षय द्वारा सर्वज्ञत्वका भी सम्भव नहीं। इस तरह सामान्य सर्वशत्वकी सिद्धि के द्वारा अन्तमें अन्य तीर्थङ्करोंमें सर्वज्ञत्वका असम्भव बतलाकर केवल सुगतमें ही उसका अस्तित्व सिद्ध किया है और उसीके शास्त्रको ग्राह्य बतलाया है। शान्तरक्षितकी तरह प्रत्येक सांख्य या जैन श्राचार्यका भी यही प्रयत्न रहा है कि सर्वशस्वका सम्भव अवश्य है पर वे सभी अपने-अपने तीर्थङ्करों में ही सर्वशत्व स्थापित करते हुए अन्य तीर्थकरोंमें उसका नितान्त असम्भव बत. लाते हैं। - जैन श्राचार्योंकी भी यही दलील रही है कि अनेकान्त सिद्धान्त ही सत्य है । उसके यथावत् दर्शन और अाचरणके द्वारा ही सर्वशत्व लभ्य है | अनेकान्तका साक्षात्कार व उपदेश पूर्णरूपसे ऋषभ, वर्द्धमान श्रादिने ही किया अतएव वे ही सर्वज्ञ और उनके उपदिष्ट शास्त्र ही निर्दोष व ग्राह्य हैं। सिद्धसेन हों या समन्तभद्र, अकलङ्क हों या हेमचन्द्र सभी जैनाचार्योंने सर्वसिद्धि के प्रसङ्गमें वैसा ही युक्तिवाद अवलम्बित किया है जैसा बौद्ध सांख्यादि प्राचार्यों १. 'प्रत्यक्षीकृतनैरात्म्ये न दोषो लभते स्थितिम् । तद्विरुद्धतया दीप्ते प्रदीपे तिमिरं यथा ॥'-तत्त्वसं० का० ३३३८ । ‘एवं क्लेशावरण प्रहाणं प्रसाध्य ज्ञेयावरणप्रहाणं प्रतिपादयन्नाह--साक्षाकृतिविशेषादिति-साक्षात्कृतिविशेषाच्च दोषो नास्ति सवासनः। सर्वज्ञत्वमतः सिद्धं सर्वावरणमुक्तितः ॥'तत्त्वसं. का० ३३३६ } 'प्रभास्वरमिदं चित्तं तत्त्वदर्शनसात्मकम् । प्रकृत्यैव स्थितं यस्मात् मलास्त्वागन्तवो मताः ।'-तत्त्वसं० का० ३४३५ । प्रमाणवा० ३, २०८ । २. 'इदं च वर्द्धमानादे राम्यशानमीदृशम् । न समस्त्यात्मदृष्टौ हि विनष्टाः सर्वतीथिकाः ।। स्याद्वादाक्षणिकस्या(त्वा)दि प्रत्यक्षादिप्रबो(बा)धितम् । बहेवा. युक्तमुक्तं यैः स्युः सर्वशाः कथं नु ते ॥'-~-तत्त्वसं. ३३२५.२६ । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.229019
Book TitleSarvagnyavada
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSukhlal Sanghavi
PublisherZ_Darshan_aur_Chintan_Part_1_2_002661.pdf
Publication Year1957
Total Pages9
LanguageHindi
ClassificationArticle & Samyag Darshan
File Size95 KB
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