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________________ कह सकते हैं। ऐसा भी संभव है कि वह प्राचारके विषयमें अपनी पैतृक ऐसी ब्राह्मण परम्पराके ही प्राचारोंका सामान्य रूपसे अनुगामी रहा हो। जयराशिके जन्मस्थान, निवासस्थान या पितृदेशके बारेमें जाननेका कोई स्पष्ट प्रमाण प्राप्त नहीं हैं। परन्तु उसकी प्रस्तुत कृति तस्वोपप्लवका किया गया सर्वप्रथम उपयोग, हम इस समय, जैन विद्वान् विद्यानन्द, अनन्तवीर्य आदिकी कृतियोंमें देखते हैं। विद्यानन्द दक्षिण भारतके विद्वान् है, अतएव पुष्ट संभावना यह है कि जयराशि भी दक्षिण भारतमें ही कहीं उत्पन्न हुआ होगा । पश्चिम भारत- अर्थात् गुजरात और मालवामें होनेवाले कई जैन विद्वानोंने ' भी अपने ग्रन्थोंमें तत्त्वोपप्लवका साक्षात् उपयोग किया है; परन्तु जान पड़ता है कि गुजरात आदिमें तत्त्वोपप्लवका जो प्रचार बादमें जाकर हुआ वह असलमें विद्यानन्दकी कृतियोंके प्रचारका ही परिणाम मालम होता है । उत्तर और पूर्व भारतमें रचे गए किसी ग्रन्थमें, तत्वोपप्लवका किया गया ऐसा कोई प्रत्यक्ष उपयोग अभी तक नहीं देखा गया, जैसा दक्षिण भारत और पश्चिम भारतमें बने हुए ग्रन्थोंमें देखा जाता है । इसमें भी दक्षिण भारतकी कृतियोंमें ही जब सर्वप्रथम इसका उपयोग देखा जाता है तब ऐसी कल्पनाका करना असंगत नहीं मालूम देता कि जयराशिकी यह अयूर्व कृति कहीं दक्षिणमें ही बनी होगी। जयराशिके समयके बारेमें भी अनुमानसे ही काम लेना पड़ता है । क्योंकि न तो इसने स्वयं अपना समय सूचित किया है और न दूसरे किसीने ही इसके समयका उल्लेख किया है। तत्वोपप्लवमें जिन प्रसिद्ध विद्वानोंके नाम आए हैं या जिनकी कृतियोंमेंसे कुछ अवतरण आए हैं उन विद्वानों के समयकी अन्तिम अवधि ई० स० ७२५ के आसपास तककी है । कुमारिल, प्रभाकर, धर्मकीर्ति और धर्मकीर्तिके टीकाकार श्रादि विद्वानोंके नाम, वाक्य या मन्तव्य तत्वोपप्लवमें ' मिलते हैं। इन विद्वानोंके समयकी उत्तर अवधि ई० स० ७५० १. अष्टसहस्री, पृ० ३७ । सिद्धिविनिश्चय, पृ० २८८ । २. गुजरात तथा मालवामें विहार करनेवाले सन्मति के टीकाकार अभयदेव, जैनतर्कवार्तिककार शान्तिसू रि,स्याद्वादरत्नाकरकार वादी देवसूरि,स्याद्वादमंजरीकार मलिणसूरि आदि ऐसे विद्वान हुए हैं जिन्होंने तत्त्वोपप्लवका साक्षात् उपयोग किया है। ३. कुमारिलके श्लोकवार्तिककी कुछ कारिकाएँ तत्वोपप्लवमें (पृ० २७, ११६) उद्धृत की गई हैं। प्रभाकरके स्मृतिप्रमोषसंबंध मतका खण्डन जयराशिने Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.229013
Book TitleTattvopapplavasinha
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSukhlal Sanghavi
PublisherZ_Darshan_aur_Chintan_Part_1_2_002661.pdf
Publication Year1957
Total Pages31
LanguageHindi
ClassificationArticle & 0_not_categorized
File Size63 KB
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