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________________ 79826 का सहयोग लिया गया है। एतदर्थ उनका भी आभार। श्री रामविजयोपाध्याय विरचित सहस्रकूट जिन स्तवन (ढाल आदिसर हो सोवन काय एहनी) सिद्धाचल हो तीरथराय, सहसकूट जिन वंदीयै। जिनवरना हो सहु बिंब जोइ, तिहां मन झाण सुं संधीये।।1।। सिमाजहोतीरथरायसहसा इण भरहे हो सिरि जिणराय, गय उसप्पिणि काल में। जिवदाये जिनबरना पडि नामे हो ते सह देव, ल्याऊं झाण संभाल में। 12 || हासविंजार सिननक रिसहादिक हो जिण चोवीस, वंदूं इण अवसप्पिणी। रासुसंधीय शावरहदा वलि हुइस्यै हो अणागयकाल, ते पिण वांदूं जगधणी।।3।। चोवीसे हो त्रिण्हे काल, बहुतरि 72 जिण वंदूं धडै / सिरिजिया रायगयनसप्यरिख एरवय खंड को बहुत्तरि 72 एम, जंबूदीव सह जूडे / / 4 / / কাট ওদিনদিৱৰৰ बिहुं भरहे हो धाइयसंड, सय चम्माल 144 जिण गाईये। aलावाकाएपसंतालनरि बिहुं एरवय हो सय चम्माल 144, काल त्रिण्हे करि ध्याइए।।5।। सहाधिकाजिरवावीसव इम बीजे हो संड जिणदेव, बिसे अठ्यासी 288 वंदीये। शवसप्पिणी वस्तिक इतला ही हो त्रीजे दीव, अरधपुक्खर अंभिनंदीये / / 6 / / स्पदामागयकाल पिण सहू मेलवि हो त्रिण्हे दीव, सगसय वीस 720 जिणेसरा। वरंजगधगीचोवीसह समवायांग हो सूत्र मझार, नामैं पामुं ते खरा।।7 || विरोदकाल वऊरिजमा त्रिण्ह दीवे हो पंच विदेह, इग सो साठि 160 वीजै चवै। एरवयवमहायज विहरंता हो इहां जिणनाह, समकालै इतलां हुवै।।8।। सिद्धांते हो अंग उवंग, एहना नाम न मैं लह्या। पिण वंदू हो विजय संभारि, ए जिणवर मैं सरदह्या।।9।। सरवाले हो ए सहू होय, अडसै असीय 880 तीर्थंकरा। कल्याणक हो वलि वंदनीक, चोवीसे हो जिणवरा / / 10 / / इक-इक जिण हो पण-पण वार, वंदू पंच कल्याणके। इम करता होइ एगसो बीस 120, वंदण जोग वली तिके।।11।। सह संख्या हो सहस 1000 ए होई, हिवे वलि माहाविदेह में। विहरंता हो इणहीज काल, वीस जिणंद वांदू इमे।।12।। हिव च्यारे हो जिणवर नाम, जिहिं तिह कालहिं पामीयै। सासय जिण हो तिण ए च्यार, हूं वांदू धरि सुधि हीयै / / 13 / / पाछलडी हो संख्या मेलि, सहस ऊपरि चौवीस 1024 ए। ए थापना हो श्री सिद्धसैल, सहसकूट वांद्या मए / / 14 / / जिणवर ना हो नाम जपंत, वांदता गुण गावतां / भवियण ने हो बोधि सुलभ, सिद्धि सुलभ वलि ध्यावतां / / 15 / / हिव मुझने हो सिरि जिणदेव, सरणे राखि संभालज्यो। वीनतडी हो माहरी एम, करम बंधण थी टालिज्यो / / 16 / / / / कलश / / इम सयल जिणवर दुरिय दुहहर, सिद्ध कूटै संथव्या। देवाधिदेव तिलोय सामी, अंतरजामी विनव्या।। जिनलाभसूरि सुरीस सांनिधि, रामविजय पाठक कहे। ए तवन भणतां श्रवण सुणता, सयल जिनयात्रा लहै।।17 || ।।इति सहस्रकूट जिन स्तवनम् / / सं. 1854 माघ वदि 12 शुक्रे। -जिनहरि विहार धर्मशाला, तलेटी रोड़, पालीताना 364270, गुजरात 15| जहाज मन्दिर * मार्च - 2017
SR No.212420
Book TitleSahasrakoot Jin Stavan
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMehulprabhsagar
PublisherMehulprabhsagar
Publication Year2017
Total Pages3
LanguageHindi
ClassificationArticle & 0_not_categorized
File Size259 KB
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