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________________ धर्माचरण से पंडित, हितकारी प्रिय वचन बोलने से वक्ता तथा दूसरों को सम्मान देने से संयम धारो तप करो मन मत करो अधीर। तरूवर बढ़त फलत वही जो पावे शुचि नीर।जैसी उक्तियाँ भी उपरोक्त कथन का समर्थन करती प्रतीत होती हैं। ब्याज से दोगुना व्यापार से चोगुना, खेत से सौगुना और दान देने से अनन्तगुना लाभ होता है। ऐसे धर्म के दस लक्षणों पर चलकर मानव प्रकृति को अपने अधीन करने की कोशिश के बजाय प्रकृति को अपना सहचर बनाने का प्रयास करने के लिए प्रेरित होगा और ऐसे सुख और आनंद की अनुभूति करेगा जो उस इत्र की भाँति है हैं जिसे जितना अधिक दूसरों पर छिड़केंगे, उतनी ही अधिक सुगंध आपके भीतर समायेगी। यही स्वस्थ समाज की रचना का आधार है। ***** वर्तमान पत्रव्यवहार का पता- डॉ. दीपा जैन c/o डॉ. लोकेश जैन,फैकल्टी-सी.एस. आर.एम., गुजरात विद्यापीठ, ग्रामीण परिसर-राँधेजा 382620 जिला- गांधीनगर (गुजरात) 9427026647 संदर्भ 1. श्री तत्त्वार्थसूत्रम्- टीका-हरिभद्र, ऋषभदेव केशरीमल संस्था, रतलाम सं. 1662. 2. तत्त्वार्थसूत्र, पार्श्वनाथ विद्याश्रम शोधसंस्थान, वाराणसी 1984. नवम अध्याय-9 3. तत्त्वार्थाधिगमसूत्र (सिद्धसेनगणि कृत भाष्यानुसारिणिका समलंकृत, हीरालाल रसिकलाल कापड़िया की टीका। 4. पं. दौलतरामजी कृत छःढाला
SR No.212302
Book TitleJain Darshan me Varnit Dharm ke Dash Lakshano ka Manviya Vikas se Samajik Sarokar
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDeepa Jain
PublisherDeepa Jain
Publication Year
Total Pages9
LanguageHindi
ClassificationArticle, 0_not_categorized, & Paryushan
File Size123 KB
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