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होगा। उदाहरणार्थ भावबन्ध से अन्तर्मुहूर्त में दिशा परिवर्तन हो जाता है। वैश्या व साध्वी के एक दृष्टान्त के द्वारा इसे भली-भाँति समझा जा सकता है- एक वेश्या एवं एक साध्वी के रहने का स्थान आमने- सामने था। दोनों एक दूसरे के वैभव व कार्य-कलापों को देखती और उनके न होने का मलाल भी करती थी। अर्थात वेश्या साध्वी को देखकर सोचती थी कि ये साध्वी कितनी नसीब वाली हैं जिन्हें धर्म-ध्यान करने का सुयोग मिला है वहीं साध्वी के भाव वेश्या के ठाठ-बाट को देखकर उनको न भोग पाने का अफसोस मनोमन व्यक्त करते थे। यह स्थिति(भेष या क्रियाचरण) के विपरीत मनोदशा ही तो थी जिसने उनकी गति की दिशा ही बदल दी। हुआ यूं जब वेश्या मरी तो उसका मृत शरीर जंगल में फेंका गया किन्तु परिणाम विशुद्धि के चलते वह सद् गति को प्राप्त हुई ओर साध्वी की मृत्यु महोत्सव की पालकी तो सजी किन्तु परभव बिगड़ गया और वे नरक गति को प्राप्त हुई। यदि कोई श्रमण या श्रावक सांसारिक भोगविलास का प्रत्यक्ष रूप से त्याग कर देता है किन्तु उसका मन उन्हीं के चिन्तवन में रत रहता है या भटकता रहता है तो यह ब्रहम्चर्य की उपासना का खण्डन ही माना जाएगा। इसके विपरीत यदि वह सांसारिकता में रहते हुए भावनात्मक तौर पर इनके प्रति अनासक्ति धारण कर लेता है तो वह सही मायनों में
मचर्य का पालन करता है। इसीलिए छःखण्ड के अधिपति प्रथम तीर्थंकर भगवान आदिनाथ के पुत्र भरत चक्रवर्ती को ब्रह्म योगी कहा जाता था जिन्हें अनासक्ति योग के अभ्यास के चलते क्षण मात्र में केवलज्ञान हो गया था। यह धर्म सकारात्क ऊर्जा के सृजन में अहम् भूमिका निभाता है। जब ऊर्जा प्रार्थना से जुड़ती है तब परमात्मा बनाती है और जब ऊर्जा वासना से जुड़ती है तब पापात्मा बनाती है। उपसंहारअन्त में हम कह सकते हैं कि जैन दर्शन में वर्णित धर्म के दश लक्षण मानव विकास में अहम् भूमिका निभाते हैं। स्वस्थ समाज और निरोगी मानसिकता के विकास हेतु ये लक्षण मनुष्य को कषाय परिणाम और विकारी भावनाओं से दूर करने में सहायक सिद्ध हो सकते हैं जिससे मनुष्य पाषविक वृत्तिको छोड़कर, मान कषाय के दंभ के दायरे से बाहर निकल कर सही- गलत और अच्छे- बुरे में फर्क करने की अपनी अन्तर्हित क्षमताओं व शक्तियों को जाग्रत कर सके जिनको वह प्रमाद व अज्ञानवश भुला बैठा है। रण में विजय प्राप्त करने से व्यक्ति शूरवीर नहीं होता, अध्ययन करने से पंडित नहीं होता, वाणी की चतुराई से वक्ता नहीं होता और धन के देने से दाता नहीं होता किन्तु इन्द्रियों की विजय से शूरवीर,