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की दृष्टि से क्रोधादि 25 कषायों व राग-दवेषादि विकारी भावों का त्याग ही सच्चा त्याग है। इसके अभ्यास व साधना की वकालत दश धर्म का यह अंग करता है। उत्तम आकिञ्चनउत्तम आकिंचन का अर्थ है परिग्रह न करना। परिग्रह परिमाण के धीरे धीरे कम करते जाना उत्तम आकिंचन धर्म कहा गया है। भौतिकवाद व विलासतापूर्ण जीवनशैली में अंधे होकर हम संसाधनों के बेहताशा विदोहन व अराजकता को बढ़ावा दे रहे हैं। इसीलिए किसी के अकूत साधन सम्पत्ति है तो किसी के दो समय का भोजन व सिर छिपाने की छत भी नहीं है। समाज में से इस असमानता को कम करने हेतु यह आकिंचन धर्म महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर सकता है। परिग्रह के 24 भेद बताए गए हैं जिसमें 10 बहिरंग और 14 अंतरंग परिग्रह हैं। हमें संसार में रहकर यह चिंतन करना चाहिए कि इस पृथ्वी का अणुमात्र भी मेरा नहीं है में आकिञ्चन्य हूँ चैतन्य आत्मा ही मेरा है। इस संसार में परिग्रह रूपी पिशाच ने संसारी प्राणी को सर्वाधिक त्रास दिया है जो परिग्रह को तजता है वही सिद्ध शिला में वास करता है। उत्तम ब्रह्मचर्य
उत्तम ब्रह्मचर्य धर्म का अर्थ है कि मन के कामुक, अनैतिक विचारों व आचरण पर अंकुश लगाकर स्वयं को ब्रहम्त्व की ओर मोड़ना। सामजिक - धार्मिक व्यवस्थाओं के तहत संसति को आगे बढ़ाने हेतु उसके पास जो है उससे वह संतुष्ट न होकर बाहर की ओर कामांधता दर्शाता रहता है। ब्रहम्चर्य के अभाव में समाज में अराजकता का बोलबाला बड़ा है। संघर्ष व वैमनस्यता ने स्थान लिया है। नारी का शोषण बढ़ा है और मानवाधिकारों के हनन की आज पराकाष्ठा हो चली है। ऐसे में सामाजिक शांति कायम करने हेतु यह स्पष्ट तौरपर समझने का प्रयास करना होगा कि बाहरी सांसारिक आकर्षण परिभ्रमण के निमित्त कारण हैं इसलिए अपने विकारी भाव के शमन करने हेतु देखने का नजरिया बदलना है। क्योंकि पदार्थों की उपस्थिति व स्थिति तो बदल नहीं सकती अगर कुछ बदला जा सकता है तो वह है अपना उपयोग जो सजीव और अजीव पर पदार्थों में लगा होता है। पर स्त्री रमण व विषय भोग आत्मिक पतन के कारण हैं। इसीलिए सुधी श्रमण इनका त्याग करते हैं। कहा भी है- संसार में विषयाभिलाषा तजि गए जोगीस्वरा। ब्रहम्चर्य के द्वारा परमब्रह्म की निर्बाध साधना की जा सकती है। इस संदर्भ में गुणस्थान की द्रव्य लिंगी व भावलिंगी सिद्धान्त की सोच का इस दिशा में अनुकरण व अध्ययन समझने की दृष्टि से प्रसंगिक