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________________ उत्तम तप कहा जाता है कि बिना तपे सोना भी कुंदन नहीं बनता। तप आत्मा पर आवरणरूप अष्टकर्मों की निर्जरा का पुरुषार्थयुक्त साधन है। तप दो प्रकार का होता है - अंतरंगतप और बहिरंगतप। तत्वार्थ सूत्र में अंतरग तप के उपभेद इस प्रकार कहे हैं- प्रायश्चित, विनय, वैयावृत्ति, स्वाध्याय, व्युत्सर्ग, और ध्यान। ये भाव विशुद्धि का एक सशक्त माध्यम हैं। अनशन, अवमौदर्य, रसपरित्याग, व्रतपरिसंख्यान, कायक्लेश, विविक्त शय्याशन | आदि बहिरंग तप कहे गये हैं जो कर्मकांड व आचरण के माध्यम से जीवन शैली का हिस्सा बनते हैं। जो जीव अहंकार को छोड़कर तपस्या करता है वह मुक्ति को प्राप्त होता है। तपस्या करने से ही विषरूप भोग निर्विषता को प्राप्त होते है। श्रमण उत्कृष्ट साधना हेतु इन 12 तपों की आराधना करते है जबकि श्रावकों से यथाशक्ति नियत परिमाण में इस तप धर्म की आराधना की अपेक्षा की जाती है। उत्तमत्याग अपनी न्यूनतम जरूरतों से अधिक पदार्थों का त्याग करना तथा विकारी भावों को छोड़ना उत्तम त्याग धर्म का लक्षण है। यह अपरिग्रह महाव्रत के पालन में सहायक है। संसार की कोई वस्तु साथ जाने वाली नहीं है अतः जड़ वस्तु में आसक्ति घटाकर अपना भार हल्का करना चाहिए। जैन दर्शन में चार प्रकार के दान को प्राधान्य दिया गया है- औषध ( दवा आदि), शास्त्र (विद्या), अभय ( निबल की रक्षा, क्षमा) और आहार (भोजन) का दान । उत्कृष्ट दान की कुछ शर्तें हैं यथा- दान देकर मन में हर्ष व उल्लास की अनुभूति रहनी चाहिए किन्तु उसका अभिमान नहीं। कहते हैं एक हाथ से किए गए दान का दूसरे हाथ को भी अहसास नहीं होना चाहिए। यदि जरूरतमंद को दिए गए दान का अहसास अपनी प्रशंसा के उद्देश्य से बार बार किया जाय तो सामने वाला व्यक्ति हीनता का अनुभव करता है। दान हेतु उत्तम पदार्थ का होना जरूरी है। सामान्यतया व्यवहार में यह देखा जाता है कि हम उस पदार्थ का दान करके आत्मप्रशंसा पाने की जुगत में लगे रहते हैं जिनका उपयोग अपने लिए करना नहीं चाहते। होना ये चाहिए कि जो हम अपने लिए पसंद न करें वह दूसरों के पल्ले मड़कर खोटी वाहवाही न लूटें । दान दाता व पात्र की उपयुक्तता उत्तम त्याग के लिए अनिवर्य है। तत्वार्थ सूत्र में कहा गया है कि विधि द्रव्य दात्रपात्र विशेषा तद्विशेषः। सद् पात्र को दिया गया उत्तम पदार्थों का दान व्यवहारनय से उत्तम त्याग है। निश्चयनय 6
SR No.212302
Book TitleJain Darshan me Varnit Dharm ke Dash Lakshano ka Manviya Vikas se Samajik Sarokar
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDeepa Jain
PublisherDeepa Jain
Publication Year
Total Pages9
LanguageHindi
ClassificationArticle, 0_not_categorized, & Paryushan
File Size123 KB
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