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इस हेतु विषयादिक पदार्थों के प्रति अपनी आसक्ति को समाप्त करना है। लोभ पाप का जनक है, कषायादि सर्व परिग्रह का त्याग करके जो व्यक्ति निलोभी बनता है वही मुक्ति रमा का वरण करता है। कर्म और भाग्य से अधिक पाने का लालच भी सदैव पाप कर्म कराता है और भावनात्मक अशुचि का कारण बनता है। शरीर शुद्धि तो व्यवहारनय की दृष्टि से शौच कही जाती है किन्तु विकारी भावों से मुक्त होने का जतन ही आन्तरिक शुचिता की
ओर एक सफल कदम कदम है। इसके परिणामस्वरूप समाज में जो निर्मलता देखने को मिलेगी वह सच्चे सुख की प्रदाता होगी एवं मानवीयता का संरक्षण करने में कारगर सिद्ध होगी। फणहस्त नाम का व्यक्ति अकत धन का स्वामी होकर भी लोभी था अन्त में उसने अनन्त दुर्गतियों के दुःखों को सहन किया। अंतरंग और बहिरंग समस्त परिग्रह के त्याग को उत्तम शौच धर्म कहते हैं। मिथ्यात्व, क्रोध, मान, माया, लोभ, हास्य, रति, अरति, शोक, भय, जुगुप्सा, स्त्रीवेद, पुरुषवेद और नपुसंकवेद को अंतरंग परिग्रह कहते हैंतथा सोना,चाँदी आदि भौतिक पदार्थ बहिरंग परिग्रह कहे जाते हैं। उत्तम संयमबिषय कषाय में दौड़ते हुए आत्मा को रोककर सुमार्ग में प्रवर्तन हेतु जो आचरण किया जाता है उसे संयम कहते हैं। संयम संसार को समाप्त करने के लिए यम के समान है। यमनियम की भाँति संयम को धारण कर अपनी जरूरतों को मर्यादित करने तथा पंचेन्द्रियों के विषयों को वश में करने से जितेन्द्रिय बनने हेतु आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त करता है। संयम के बिना जीवन, आचरण व विचार सभी बेलगाम हो जाते हैं। यह स्वयं के ऊपर अनुशासन करने की कला है जो हमे इन्द्रियों का दास होने से बचाता है। जैन दर्शन के अनुसार सयम
संयम व मानव का एक संबंध है। तीर्थंकर के वैराग्योपरान्त साधना वन तक पालकी को उठाकर लेजाने का अधिकार सर्व प्रथम मनुष्य को प्राप्त होता है क्योंकि मनुष्य पर्याय में ही सकल संयम को धारण किया जासकता है देव,त्रियंच व नरक पर्याय में नही। संयममय जीवन आर्थिक रूप से ही नहीं अपितु सुखमय सामाजिक वातावरण की दृष्टि से भी उपयोगी है। इसके चलते किसी भी राष्ट्र के सामूहिक संसाधनों के उपयोग पर सभी को समान अधिकार मिल सकेगा और आपाधापी पर रोक लगकर शांतिपूर्ण समाज की संरचना को आकार मिलेगा। संयमपूर्ण जीवन अनावश्यक उपार्जन की चिन्ताओं से मुक्त कर उस समय का आत्मिक उन्नति के लिए उपयोग कर सकता है।