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रखकर अपने चंचल चित्त को रोकने के लिए आर्जव( ऋजुता) का सहारा लेना चाहिए। उनका विश्वास मत करो जिनकी भावनाएं वक्त के साथ बदल जाती हैं, विश्वास उनका करो जिनकी भावना वैसी ही रहे जब आपका वक्त बदल जाऐ। किन्तु सभी के साथ अपना व्यवहार सम्यकत्व से परिपूर्ण रखो। उत्तम सत्य
"बोलो वही जिसके नीचे हस्ताक्षर कर सको, और सोचो वही जो वे हिचक बोल सको।" सत्य सर्व धर्म का प्रधान धर्म है। सत्य का जगत में सबसे ऊँचा स्थान है। सत्य का मार्ग सबसे सीधा है। संसार समुद्र को पार करने के लिए सत्य ही नौकारूप है। भगवान महावीर ने अहिंसा को पहला धर्म कहा है तथा सत्य को दूसरे नंबर पर रखा है इसलिए सत्य को दूसरी नौका कहा है। सत्य ऐसा भी न बोलो जिससे प्रत्यक्ष या परोक्ष हिंसा हो। भ्रम की स्थितियां उत्पन्न हो जो दूसरों को सही निर्णय लेने में रोकती हों। दशलक्षण धर्म के प्रसंग में कहा भी हैऊँचे सिंहासन बैठि वसु नृप, धर्म का भूपति भया। वसु झूठ सेती नरक पहुँचा, स्वर्ग में नारद गया। राजा वसु ने झूठ का पक्ष लिया तो उसे नरक जाना पड़ा तथा सत्यघोष भी झूठ के कारण स्वयं अपने ही गले की फाँसी बना राग द्वेष के वशीभूत होकर असत्य वचन नहीं बोलना चाहिए। समाज को सही दिशा में ले जाने एवं स्थायित्व लाने हेतु सत्य के अलावा कोई भी छोटा रास्ता नहीं है। हिन्दी के प्रसिद्ध कवि तुलसीदास ने भी सत्याचार के संबंध में कहा है कि जीवन में जब संकट की स्थिति हो तब हमारे शब्दों में भक्ति प्रताप तेज और बल होना चाहिए। भक्ति हमारे शब्द और आचरण में बसती है प्रताप का अर्थ है जबरदस्त पुरुषार्थ यह बोलता ही नही करता भी है तेज हमारे शब्दों में पवित्रता लाता है और बल का अर्थ है अन्याय के विरुद्ध बल की वृत्ति। ईमानदारी और सत्य निष्ठा को मापने का कोई पैमाना नही होता। जीवन और मृत्यु जिव्हा के वश में है इसलिए अनुचित शब्दों का प्रयोग न करें। अहिंसा और सत्य का आश्रय इस दिशा में आत्मबल प्रदान करता है। उत्तमशौचआत्मा को पवित्र करने वाला यह शौच धर्म है जो बाह्य शुद्धि के स्थान पर आन्तरिक भावों की विशुद्धि पर ध्यान देता है। क्रोधादि कषायों के कारण जो विकार व विकृतिजनित अशुचि उत्पन्न हुई है उसके जतन हेतु चिन्तन मनन और शुद्धाचरण के द्वारा साधना की जाती है।