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________________ (आ) चक्रवर्ती-भरत, सगर, मघवा, सनत्कुमार, शांतिनाथ, कुंथुनाथ, अरहनाथ, सुभौम, महापद्म, हरिसेन, जयसेन, ब्रह्मदत्त । (इ) बलदेव-रथ, विजय, अचल, सुधर्म, सुप्रभ, सुदर्शन, नंदिमित्र, राम, पद्म । (६) वासुदेव त्रिपृष्ठ, द्विपृष्ठ, स्वयंभू, पुरुषोत्तम, पुरुषसिंह, पुरुषवर, पुंडरीक, दत्तनारायण, कृष्ण । (उ) प्रतिवासुदेव-अश्वग्रीव, तारक, मेरक निसुंभ, मधुकैटभ, बली, प्रहरण, रावण, जरासंध । भगवान् महावीर स्वामी के समवशरण में राजा श्रेणिक की प्रार्थना एवं जिज्ञासा पर परमपूज्य श्री गौतम गणधर ने वेसठ महापुरुषों की कथा, उनके पूर्वभव एवं जिनवाणी के सार का निरूपण किया था। सम्राट् श्रेणिक एवं गौतम गणधर के प्रश्नोत्तर से निःसृत साहित्य को पौराणिक साहित्य कहा जाता है । पौराणिक मान्यताओं के अनुसार त्रेसठ शलाका पुरुषों में वर्णित सभी तीर्थकर मोक्ष पाते हैं। बलदेव भी ऊर्ध्वगामी होते हैं। वासुदेव और प्रतिवासुदेव अधोगामी होते हैं । चक्रवर्तियों में ऊर्ध्वगामी एवं अधोगामी दोनों होते हैं। सठ शलाका पुरुष भव्य होते हैं। भेदाभेद रत्नत्रयात्मक धर्म को धारण कर उसी भव से स्वर्ग जाने की जो कथा कही जाती है उसे अर्थाख्यान कहते हैं । मोक्ष जाने तक जो कथा है वह चारित्र कहलाती है। तीर्थकर और चक्रवर्ती के कथानक को पुराण कहते हैं। आचार्य श्री द्वारा प्रणीत साहित्य में पुराण, चारित्र एव अर्थाख्यान तीनों का समावेश है। ___ आचार्य श्री द्वारा प्रणीत साहित्य में प्रथमानुयोग संबंधी सामग्री प्रचुर मात्रा में है। प्रस्तुत शीर्षक के अन्तर्गत इनमें से कतिपय प्रमुख रचनाओं पर विचार-विमर्श किया जायेगा। भगवान महावीर और उनका तन्व दर्शन आचार्य श्री का भगवान् महावीर स्वामी के प्रति विशेष रागात्मक सम्बन्ध रहा है। इसी कारण वे भगवान् महावीर की पावन वाणी एवं संदेश को विश्वव्यापी बनाना चाहते हैं। आपने अपने बृहदकाय ग्रंथ 'भगवान् महावीर और उनका तत्त्व-दर्शन' में श्रावक समुदाय को आशीर्वचन देते हुए लिखा है-'यह हमारा सौभाग्य है कि वर्तमान काल में हम सब परम तीर्थंकर शासन देव भगवान् महावीर के कल्याणकारी शासन-तीर्थ में रह रहे हैं और उनके लोकपावन शासन में रहकर आत्म-कल्याण की राह पर चल रहे हैं। इससे भी अधिक सौभाग्य की बात यह है कि भगवान् महावीर का २५०० वां निर्वाण महोत्सव मनाने का हमें सुयोग मिल रहा है। इस महोत्सव के उपलक्ष्य में भगवान् महावीर का जीवन-परिचय और उनका तत्त्वदर्शन समझने का सुअवसर सर्वसाधारण को सुलभ करने की भावना हमारे मन में थी।" आचार्य श्री के दृष्टिकोण में भगवान महावीर स्वामी का स्वरूप अत्यन्त विराट् था। उनकी मान्यता है कि, “व्यक्ति की एक सीमा होती है, वे असीम थे। उनका व्यक्तित्व असीम था । वह देश, काल, जाति आदि की क्षुद संकीर्णताओं से अतीत तथा विराट् थे।" प्रस्तुत ग्रंथ में भगवान महावीर के पूर्व भवों और वर्तमान जीवन का परिचय दिया गया है। पुरुरवा भील द्वारा मुनि सगरसेन से मद्य-मांसादि के त्याग का नियम, व्रत के प्रभाव से सौधर्म नामक महाकल्प विमान में महाऋद्धिधारी देव स्वरूप को प्राप्त करना, तत्पश्चात् आद्य तीर्थंकर श्री ऋषभदेव के पौत्र मरीचि के रूप में उत्पन्न होना और फिर अनन्तानन्त भवों में भ्रमण करके अन्तिम तीर्थकर महावीर के रूप में अवतरित हो जाना इस काव्य का विषय है। भगवान् महावीर स्वामी के गर्भ, जन्म, तप, ज्ञान एवं मोक्षकल्याणक का भी हृदयस्पर्शी वर्णन है । भगवान् महावीर के पूर्वभवों की कथा के रूप में आचार्य श्री द्वारा दी गई टिप्पणियों से ग्रंथ ने विशाल रूप ले लिया है। प्रस्तुत ग्रंथ के अन्य भागों में जो महत्त्वपूर्ण एवं उपयोगी सामग्री दी गई है उसके कारण यह ग्रन्थ एक तीर्थंकर का पुराण होते हुए भी महापुराण बन गया है। भरतेश वैभव आचार्य श्री को आद्य तीर्थकर भगवान् ऋषभदेव के पराक्रमी पुत्र चक्रवर्ती भरत ने विशेष रूप से अभिभूत किया है। सम्राट भरत हमारे देश की आध्यात्मिक विद्या के गौरव-पुरुष रहे हैं। उनकी विजयवाहिनी ने ही सर्वप्रथम इस देश को एकछत्र शासन के अन्तर्गत संगठित किया था। विक्रम व पौरुष से सम्पन्न सम्राट् भरत वैभव की अट्टालिकाओं में रसक्रीड़ा करते हुए भी परमयोगी थे। इसी साधना के बल पर सम्राट भरत ने दिगम्बर दीक्षा ग्रहण करने के पश्चात् युग-युगान्तर के कर्म क्षण भर में निर्मूल करके मुक्ति के पथ को पा लिया था। आचार्य श्री ने इस मोक्षदायिनी कथा का सरस, रोचक एवं सरल शैली में प्रस्तुतीकरण किया है। इस कथा के माध्यम से आचार्य श्री ने भारत की सुप्त आत्मा को झककोरा है और सांसारिकता में लिप्त मानवजाति को गृहस्थ धर्म का पालन करते हुए भी निलिप्त जीवन व्यतीत करने का सन्देश दिया है। आचार्यरत्न श्री देशभूषण जी महाराज अभिनन्दन ग्रन्थ For Private & Personal Use Only Jain Education International www.jainelibrary.org
SR No.212199
Book TitleSahitya purush Acharyaratna Deshbhushanji
Original Sutra AuthorN/A
AuthorRameshchandra Gupta, Sumatprasad Jain
PublisherZ_Deshbhushanji_Maharaj_Abhinandan_Granth_012045.pdf
Publication Year1987
Total Pages16
LanguageHindi
ClassificationArticle & Ascetics
File Size2 MB
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