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________________ ४०८ | पूज्य प्रवर्तक श्री अम्बालालजी महाराज-अभिनन्दन ग्रन्थ 000000000000 000000000000 MINN पण ACKET मरण-शुद्धि भी कर सकते हैं, और जो मृत्यु संसार के लिए शौक का कारण बनती है, वही मृत्यु हमारे लिए महोत्सव बन सकती है। प्रश्न यह है कि हम मरण-शुद्धि किस प्रकार करें, मृत्यु के भय को उल्लास के रूप में किस प्रकार बदलें ? बस, यही कला मृत्यु कला है। जीने की कला सीखना आसान है। किन्तु मरने की कला सीखना कठिन है। जैनशास्त्र मनुष्य को जीने की कला ही नहीं सिखाते, बल्कि मरने की कला भी सिखाते हैं । मृत्यु से अभय होकर मृत्युंजय बनने का मार्ग बताते हैं । इस सम्बन्ध में मरण-विषयक चर्चा पर हमें गम्भीरता से विचार करना है। मरण के विविध भेद भगवती सूत्र में एक प्रसंग है। स्कन्दक परिव्राजक ने भगवान से पूछा - "भगवन् ! किस प्रकार का मरण प्राप्त करने से भव परम्परा बढ़ती है और किस प्रकार के मरण से घटती है ?" उत्तर में भगवान ने मृत्युशास्त्र की काफी विस्तृत व्याख्या स्कन्दक के समक्ष प्रस्तुत की। भगवान ने कहा- "बाल-मरण प्राप्त करने से जन्ममरण की परम्परा बढ़ती है और पंडित मरण प्राप्त करने से भव परम्परा का उच्छेद हो जाता है।"१० उत्तराध्ययन में भी इसी तरह दो प्रकार के मरण की चर्चा है--सकाम मरण और अकाम मरण । यहाँ सकाम का अर्थ है-'विवेक एवं चारित्र युक्त' तथा –'सदसद्विवेक विकलतया तेषां अकाम'--विवेक रहित मरण अकाम मरण है । अकाम मरण (बाल मरण) अज्ञानी जीव बार-बार करते रहते हैं, किन्तु सकाम मरण (पंडित मरण) जीवन में एक बार ही होता है।" यहाँ पंडित मरण एक बार ही बताया गया है, जिसका अर्थ है--ऐसी मृत्यु जो बस अन्तिम मृत्यु हो, ज्ञानी कर्म क्षयकर ऐसी मृत्यु प्राप्त करते हैं कि पुनः मरना ही न पड़े । वास्तव में वही मृत्यु तो महान् मृत्यु है, जिसको स्वीकार कर लेने पर फिर कभी मृत्यु न आये । 'मरण विभक्ति' नामक ग्रन्थ में एक जगह कहा है-- 'तं मरणं मरियब्बं जेणमओ मूक्कओ होई ।१२ अर्थात् मरना ही है तो ऐसा मरण करो कि जिससे मरकर सीधे ही मुक्त हो जाएँ । मृत्यु के चक्र से सदासदा के लिए छुटकारा हो जाए, ऐसा मरण मरना ही पंडित मरण है। पंडित मरण की व्याख्या के पूर्व बालमरण का स्वरूप भी समझ लेना चाहिए । स्कन्दक के प्रश्न के उत्तर में भगवान ने बालमरण के बारह भेद इस प्रकार बताये हैं (१) बलन्मरण--सामान्यत: बलन्मरण का अर्थ करते हैं, भूख-प्यास से तड़पते हुए प्राण त्यागना । किन्तु प्राचीन ग्रन्थों में बलम्मरण का अर्थ इस प्रकार बताया है संजम जोग विसन्ना मरंति जे तं तु बलायमरणं तु ।१३।। ___ अर्थात् संयम-साधना स्वीकार कर लेने के बाद उसमें मन नहीं रमे, उसकी दुष्करता से घबरा जाए और व्रतों का पालन छोड़ दे, साधु वेश का भी त्याग करना चाहें, किन्तु लोक-लज्जा आदि कारणों से साधु वेश का त्याग न करते हुए उसी रूप में देह त्यागना। इस स्थिति में व्रत का सर्वथा भंग तो हो ही जाता है, किन्तु वेश जरूर रहता है। इसी कारण इसे बलन् मरण-संयम का त्याग करते हुए मरना कहते हैं। (२) बसट्र मरण-इन्द्रिय विषयों में आसक्त हए प्राण त्यागना, जैसे-दीपक की लौ पर गिरकर मरने वाला पतंगा, अपनी प्रेयसी आदि के लिए मरने वाले का भी वसट्टमरण समझना चाहिए । (३) अन्तःशल्य मरण-इसके दो भेद हैं १. द्रव्य अन्त: शल्य मरण-शरीर में बाण आदि घुसने से होने वाली मृत्यु तथा २. भाव अन्तःशल्य मरण-अतिचार आदि की शुद्धि किये बिना मरना । (४) तद्भव मरण-मनुष्य आदि शरीर को छोड़कर फिर उसी शरीर की प्राप्ति की इच्छा रखते हुए मरना। (५) गिरिपडण--पर्वत आदि से गिर कर मरना। . 2008 0000 lain ducation International For Private Personal Use Only www.ainelibrary.org
SR No.212099
Book TitleSamlekhna Ek Shreshth Mrutyukala
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSaubhagyamal Maharaj
PublisherZ_Ambalalji_Maharaj_Abhinandan_Granth_012038.pdf
Publication Year1976
Total Pages12
LanguageHindi
ClassificationArticle & Ritual
File Size2 MB
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