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________________ 640 जैन विद्या के आयाम खण्ड-६ स्तोत्र में भी मिलती है२३। (आपकी योग्यता) को प्राप्त नहीं होते हैं। हे नभ ! आप समाधियुक्त ऋग्वेद में उपलब्ध कुछ ऋचाओं की जैन दृष्टि से ऋषभदेव (युज), अतिकठोर साधक, व्रजमय शरीर के धारक और इन्द्रों के भी के प्रसंग में व्याख्या करने का हमने प्रयत्न किया है। विद्वानों से यह अपेक्षा चक्रवर्ती हैं- ज्ञान के द्वारा अन्धकार (अज्ञान) का नाश करके गा अर्थात् है कि वे इन ऋचाओं के अर्थ को देखें और निश्चित करें कि इस प्रयास प्रजा को सुखों से पूर्ण कीजिये। की कितनी सार्थकता है। यद्यपि मैं स्वयं इस तथ्य से सहमत हूँ कि इन आ चर्षाणिप्रा वृषभो जनानां राजा कृष्टीनां पुरुहूत इन्द्रः। ऋचाओं का यही एक मात्र अर्थ है ऐसा दावा नहीं किया जा सकता। अग्रिम स्तुतः श्रवस्यन्नवसोप मद्रिग्युक्ता हरी वृषणा याह्याङ्।। पंक्तियों में कुछ ऋचाओं का जैन दृष्टिपरक अर्थ प्रस्तुत है। मेरी (1.177.1) व्यस्तताओं के कारण वृषभवाची सभी 112 ऋचाओं का अर्थ तो नहीं बहुतों में प्रसिद्ध तथा बहुतों के द्वारा संस्तुत, सबके उस कर पाया हूँ, मात्र दृष्टि-बोध के लिये कुछ ऋचाओं की व्याख्या प्रस्तुत विचक्षण बुद्धि महान ऋषभदेव की इस प्रकार स्तुति की जाती है। वह है। इस व्याख्या के सम्बन्ध में भी मात्र इतना ही कहा जा सकता है कि स्तुत्य होकर हमें वीरता, गोधन एवं विद्या प्रदान करें। हम उस तेजस्वी इन ऋचाओं के जो विभिन्न लाक्षणिक अर्थ सम्भव हैं उनमें एक अर्थ यह (ज्ञान) दाता को जाने या प्राप्त करें। भी हो सकता है। इससे अधिक मेरा कोई दावा नहीं है। त्वमग्ने इन्द्रो वृषभः सतामसि त्वं विष्णुरुरुगायो नमस्यः। त्वं ब्रह्मा रयिविद्द्ब्रह्मणस्पते त्वं विधर्तः सचसे पुरन्ध्या।। ऋषभ वाची ऋग्वैदिक ऋचाओं की जैन दष्टि से व्याख्या (2.1.3) असृग्रमिन्द्र ते गिरः प्रति त्वामुदहासत! हे ज्योति स्वरूप जिनेन्द्र ऋषभ! आप सत्पुरुषों के बीच अजोषा वृषभं पतिम। प्रणाम करने योग्य हैं। आप ही विष्णु हैं और आप ही ब्रह्मा हैं तथा (1.9.4) आप ही विभिन्न प्रकार की बुद्धियों से युक्त मेधावी हैं। जिस सप्त हे इन्द्र ! (अजोषा) जिन्होंने स्त्री का त्याग कर दिया है, उन किरणों वाले वृषभ ने सात सिन्धुओं को बहाया और निर्मल आत्मा ऋषभ (पतिम्) स्वामी के प्रति आपकी जो अनेक प्रकार की वाणी (स्तुति) पर चढ़े हुए कर्ममल को नष्ट कर दिया। वे बज्रबाहु इन्द्र अर्थात् जिनेन्द्र है, वह आपकी (भावनाओं) को उत्तमता पूर्वक अभिव्यक्त करती है। आप ही हैं। (ज्ञातव्य है कि जैन परम्परा में इन्द्र ही सर्वप्रथम जिन की स्तुति करता अनानुदो वृषभो दोधतो वधो गम्भीर ऋष्वो असमष्टकाव्यः। है- शक्रस्तव (नमोत्थुणं) का पाठ जैनों में सर्व प्रसिद्ध है) रध्रचोदः शूनथनो वीलितस्पृथुरिन्द्रः सुयज्ञः उषसः स्वर्जनत। त्वमग्ने वृषभः पुष्टिवर्धन उद्यतनुचे भवसि वाय्यः। (2.21.4) य आहुतिं परि वेदा वषट्कृतिमेकायुग्ने विश अविवाससि।। दान देने में जिनके आगे कोई नहीं निकल सका ऐसे संसार (1.31.5) को अर्थात् जन्म-मरण को क्षीण करने वाले, कर्म शत्रुओं को मारने वाले हे ज्योतिस्वरूप वृषभ ! आप पुष्टि करने वाले हैं जो लोग होम असाधारण, कुशल, दृढ़ अगों वाले, उत्तम कर्म करने वाले ऋषभ ने सुयज्ञ करने के लिए तत्पर हैं उनके लिए स्वयं आकर आप सुनने योग्य हैं अर्थात् रूपी अहिंसा धर्म का प्रकाशन किया। उन्हें आहूत होकर आपके विचारों को जानना चाहिए। आप का उपदेश अनानुदो वृषभो जग्मिराहवं निष्टप्ता शत्रु पृतनासु सासहिः। जानने योग्य है क्योंकि उसके आधार पर उत्तम क्रियायें की जा सकती असि सत्य ऋणया ब्रह्मणस्पत उग्रस्य चिदपिता वीलहर्षिणः।। हैं। आप एकायु अर्थात् चरम शरीरी हैं और तीर्थंकरों में प्रथम या अग्र (2.23.11) हैं और प्रजा आप में ही निवास करती है अर्थात् आप की ही आज्ञा का हे ज्ञान के स्वामी वृषभ! तुम्हारे जैसा दूसरा दाता नही है। अनुसरण करती है। तुम आत्म शत्रुओं को तपाने वाले, उनका पराभव करने वाले, कर्म (ज्ञातव्य है- वैदिक दृष्टि से अग्नि के लिये एकायु एवं अग्र रूपी ऋण को दूर करने वाले, उत्तम हर्ष देने वाले कठोर साधक व विशेषण का प्रयोग उतना समीचीन नहीं है जितना ऋषभ तीर्थंकर के सत्य के प्रकाशक हो। साथ है। उन्हें एकायु कहने का तात्पर्य यह है कि जिनका यही अन्तिम उन्मा ममन्द वृषभो मरुत्वान्त्वक्षीयसा वयसा नाधमानम। जीवन है। दूसरे प्रथम तीर्थंकर होने से उनके साथ अग्र विशेषण भी धृणीव च्छायामरण अशीयाऽऽविवासेयं रुद्रस्य सुग्नम। उपयुक्त है (2.33.6) न ये दिवः पृथिव्या अन्तमापुर्न मायाभिर्धनदां पर्यभूवन। मरुत्वान् अर्थात् मरुदेवी के पुत्र ऋषभ हम (भिक्षुओं) को युजं वज्रं वृषभश्चक्र इन्द्रो निर्योतिषा तमसो गा अदुक्षत।। तेजस्वी अन्न से तृप्त करे। जिस प्रकार धूप से पीडित व्यक्ति छाया (1.33.10) का आश्रय लेता है उसी प्रकार मैं भी पाप रहित होकर कठोर साधक हे स्वामी (ऋषभदेव) ! न तो स्वर्ग के और न पृथ्वी के वासी वृषभ के सुख को प्राप्त कर व उनकी सेवा करू अर्थात् निर्वाण लाभ माया और धनादि (परिग्रह) से परिभूत होने के कारण आपकी मर्यादा प्राप्त करूँ। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.212078
Book TitleSwetambar Mulsangh evam Mathursangh ek Vimarsh
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSagarmal Jain
PublisherZ_Shwetambar_Sthanakvasi_Jain_Sabha_Hirak_Jayanti_Granth_012052.pdf
Publication Year1998
Total Pages7
LanguageHindi
ClassificationArticle & Jain Sangh
File Size2 MB
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