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________________ 328 जैन विद्या के आयाम खण्ड-६ वेश्यागमन का त्याग उचित ही है। यह एक शुभ संकेत ही है कि हैं किन्तु जैनाचार्यों ने इसकी जो सूक्ष्म व्याख्या की है, उस आधार न केवल जैन समाज में अपितु समग्र भारतीय समाज में वेश्यागमन पर आज का गृहस्थ वर्ग इस दुर्व्यसन से कितना मुक्त है, यह कहना की प्रवृत्ति और वेश्यावृत्ति धीरे-धीरे क्षीण होती जा रही है। यद्यपि कठिन है। व्यावसायिक अप्रमाणिकता और कर-अपवंचन आज सामान्य इस प्रवृत्ति के जो दूसरे रूप सामने आ रहे हैं वे उसकी अपेक्षा अधिक हो गये हैं। व्यावसायिक अप्रमाणिकता के इस युग में इसकी प्रासंगिकता चिन्तनीय हैं, यहाँ हमें यह स्मरण रखना चाहिए कि चाहे खुले रूप को नकारा तो नहीं जा सकता किन्तु वर्तमान युग में कौन इससे कितना में वेश्यावृत्ति पर कुछ अंकुश लगा हो, किन्तु छद्मरूप में यह प्रवृत्ति बच सकेगा, इस पर व्यावहारिक दृष्टि से विचार करना अपेक्षित है। बढ़ी ही है। जैन समाज के सम्पन्न वर्ग में इन छद्म रूपों के प्रति ललक बढ़ती जा रही है, जिस पर अंकुश लगाना आवश्यक है। गृहस्थ-जीवन की व्यावहारिक नीति 5. परस्त्रीगमन-परस्त्रीगमन परिवार एवं समाज व्यवस्था का गृहस्थ-जीवन में कैसे जीना चाहिए? इस सम्बन्ध में थोड़ा निर्देश घातक है, इसके परिणाम स्वरूप न केवल एक ही परिवार का पारिवारिक आवश्यक है। गृहस्थ उपासक का व्यावहारिक जीवन कैसा हो, इस जीवन दृषित एवं अशान्त बनता है, अपितु अनेक परिवारों के जीवन सम्बन्ध में जैन आगमों में यत्र-तत्र बिखरे हुए कुछ निर्देश मिल जाते अशान्त बन जाते हैं। वेश्यावृत्ति की अपेक्षा यह अधिक दोषपूर्ण है। हैं। लेकिन बाद के जैन विचारकों ने कथा-साहित्य, उपदेश-साहित्य क्योंकि इसमें छल-छद्म और जीवन का दोहरापन भी जुड़ जाता है। एवं आचार-सम्बन्धी साहित्य में इस सन्दर्भ में एक निश्चित रूप रेखा अत: सामाजिक दृष्टि से यह बहुत बड़ा अपराध है। आज कामवासना प्रस्तुत की है। यह एक स्वतन्त्र शोध का विषय है। हम अपने विवेचन की तृप्ति का यह छद्म रूप अधिक फैलता जा रहा है। पाश्चात्य देशों को आचार्य नेमिचन्द्र के प्रवचनसारोद्धार, आचार्य हेमचन्द्र के योगशास्त्र की वासनात्मक उच्छंखलता का प्रभाव हमारे देश में भी हुआ है। क्लबों तथा पं० आशाधरजी के सागारधर्मामृत तक ही सीमित रखेंगे। और होटलों के माध्यम से यह विकृति अधिक तेजी से व्याप्त होती सभी विचारकों की यह मान्यता है कि जो व्यक्ति जीवन के सामान्य जा रही है। जैन समाज का भी कुछ सम्पन्न एवं धनी वर्ग इसकी गिरफ़्त व्यवहारों में कुशल नहीं है, वह आध्यात्मिक जीवन की साधना में में आने लगा है। यद्यपि अभी समाज का बहुत बड़ा भाग इस दुर्गुण आगे नहीं बढ़ सकता। धार्मिक या आध्यात्मिक होने के लिए व्यावहारिक से मुक्त है किन्तु धीरे-धीरे फैल रही विकृति के प्रति सजग होना या सामाजिक होना पहली शर्त है। व्यवहार से ही परमार्थ साधा जा आवश्यक है। सकता है। धर्म की प्रतिष्ठा के पहले जीवन में व्यवहारपटुता एवं ६.शिकार-मनोरंजन के निमित्त अथवा मांसाहार के लिए जंगल सामाजिक जीवन जीने की कला का आना आवश्यक है। जैनाचार्यों के प्राणियों का वध करना शिकार कहा जाता है। यह व्यक्ति को क्रूर ने इस तथ्य को बहुत पहले ही समझ लिया था। अत: अणुव्रत-साधना बनाता है। यदि मनुष्य को मानवीय कोमल गुणों से युक्त बनाये रखना के पूर्व ही इन योग्यताओं का सम्पादन आवश्यक है। है तो इस वृत्ति का त्याग अपेक्षित है। आज शासन द्वारा भी वन्य आचार्य हेमचन्द्र ने इन्हें "मार्गानुसारी" गुण कहा है। धर्म-मार्ग प्राणियों के संरक्षण के लिए शिकार की प्रवृत्ति पर अंकुश लगाया का अनुसारण करने के लिए इन गुणों का होना आवश्यक है। उन्होंने जा रहा है। अतः इस प्रवृत्ति के त्याग का औचित्य निर्विवाद है। आज योगशास्त्र के द्वितीय एवं तृतीय प्रकाश में निम्न 35 मार्गानुसारी गुणों हम इस बात को गौरव से कह सकते हैं कि जैन समाज इस दुर्गुण का विवेचन किया है:-(१) न्याय-नीतिपूर्वक ही धनोपार्जन करना। से मुक्त है, किन्तु आज सौन्दर्य-प्रसाधनों, जिनका उपभोग समाज में (2) समाज में जो ज्ञानवृद्ध और वयोवृद्ध शिष्ट-जन हैं, उनका यथोचित धीरे-धीरे बढ़ता जा रहा है, इस निमित्त अव्यक्त रूप से हो रही हिंसा सम्मान करना, उनसे शिक्षा ग्रहण करना और उनके आचार की प्रशंसा के प्रति सजग रहना आवश्यक है। क्योंकि उनका उत्पादन उपभोक्ताओं करना। (3) समान कुल और आचार-विचार वाले, स्वधर्मी किन्तु भिन्न के निमित्त ही होता है और यदि हम उनका उपभोग करते हैं तो उस गोत्रोत्पन्न जनों की कन्या के साथ विवाह करना। (4) चोरी, परस्त्रीगमन, हिंसा एवं क्रूरता से अपने को बचा नहीं सकते हैं। सौन्दर्य प्रसाधनों असत्यभाषण आदि पापकर्मों का ऐहिक-पारलौकिक कटुक-विपाक के निर्माण एवं परीक्षण के निमित्त हिंसा के जो क्रूरतम रूप अपनाए जानकर, पापाचार का त्याग करना। (5) अपने देश के कल्याणकारी जाते हैं वे जैन पत्र-पत्रिकाओं में बहुचर्चित रहे हैं। अत: उन सब पर आचार-विचार एवं संस्कृति का पालन करना तथा संरक्षण करना। (6) यहां विचार करना आवश्यक प्रतीत नहीं होता। किन्तु इस सन्दर्भ में दूसरों की निन्दा न करना। (7) ऐसे मकान में निवास करना जो न हमें सजग अवश्य रहना चाहिए कि हम क्रूरता के भागी न बनें। अधिक खुला और न अधिक गुप्त हो, जो सुरक्षा वाला भी हो और 7. चौर्य-कर्म-दूसरों की सम्पत्ति या दूसरों के अधिकार की जिसमें अव्याहत वायु एवं प्रकाश आ सके। (8) सदाचारी जनों की वस्तुओं को उनकी बिना अनुमति के ग्रहण करना चोरी है। अपनी संगति करना। (9) माता-पिता का सम्मान-सत्कार करना, उन्हें सब आवश्यकता से अधिक संग्रह और संचय को भी चोरी कहा जा सकता प्रकार से सन्तुष्ट रखना। (10) जहाँ वातावरण शान्तिप्रद न हो, जहाँ है। जैनाचार्यों ने व्यावसायिक अप्रमाणिकता कर अप्रवंचन तथा राष्ट्रीय निराकुलता के साथ जीवन-यापन करना कठिन हो, ऐसे ग्राम या नगर हितों के विरुद्ध कार्य करना आदि को भी चोरी के अन्तर्गत माना में निवास न करना। (11) देश, जाति एवं कुल से विरुद्ध कार्य है। यद्यपि सामान्यतया जैन परिवार इस दुर्व्यसन से मुक्त कहे जा सकते न करना, जैसे मदिरापान आदि। (12) देश और काल के अनुसार Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.212054
Book TitleShravak Achar ki Prasangikta ka Prashna
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSagarmal Jain
PublisherZ_Shwetambar_Sthanakvasi_Jain_Sabha_Hirak_Jayanti_Granth_012052.pdf
Publication Year1998
Total Pages5
LanguageHindi
ClassificationArticle & Achar
File Size2 MB
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