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________________ 386 : डॉ. महेन्द्रकुमार जैन न्यायाचार्य स्मृति-ग्रन्थ अच्छा, यह बताइए कि आप ब्राह्मणत्व जीवमें मानते हो या शरीरमें या दोनोंमें या संस्कारमें या वेदाध्ययनमें ? जीव तो शद्र आदि सभीमें विद्यमान है अतः उनमें भी ब्राह्मणत्व होना चाहिए। शरीर भी पञ्चभूतात्मक सबके समान है। यदि संस्कारमें ब्राह्मणत्व माना जाता है; तो संस्कार शद्र बालकमें भी किया जा सकता है / यदि संस्कारके पहिले ब्राह्मण बालकमें ब्राह्मणत्व मानते हो तो संस्कार करना व्यर्थ ही है / यदि नहीं मानते तो जैसे ब्राह्मणत्वशन्य ब्राह्मण बालकमें संस्कारसे ब्राह्मणत्व आ जाता है उसी तरह शूद्रबालकमें भी संस्कारसे ब्राह्मणत्व आ जाना चाहिए / रही वेदाध्ययनकी बात, सो शूद्र भी देशान्तरमें जाकर वेदाध्ययन कर सकता है और करा सकता है। किन्तु इतने मात्रसे आप उसमें ब्राह्मणत्व नहीं मानते / अतः यह समस्त ब्राह्मणादि वर्णव्यवस्था सदृश क्रिया और सदश गणोंके आधारसे है। यदि जन्मना वर्णव्यवस्था हो तो बह्म, व्यास, विश्वामित्र आदिमें गुणकृत ब्राह्मणत्व आप स्वयं क्यों मानते हो? पुरोहित-तो क्या जैन ग्रन्थोंमें बताई गई वर्णाश्रम व्यवस्था झूठी है ? प्रभाचन्द्र-नहीं, झठी क्यों होगी। प्रश्न तो यह है कि वर्णव्यवस्था जन्मसे है या गुणकर्मसे ? अतः जिन-जिन व्यक्तियोंमें जो-जो गुण-गुण-कर्म पाए जायँगे उसीके अनुसार उसमें ब्राह्मण आदि व्यवहार होगा और तदनुकूल ही वर्णाश्रम व्यवस्था चलेगी। जैनदर्शन तो व्यक्ति स्वातन्त्र्यवादी है। उसमें पुरुषार्थको बड़ी गुञ्जाइश है / जैसे-जैसे गुण-धर्मोंका विकास व्यक्ति करेगा उसीके अनुसार उसमें ब्राह्मणत्व आदि व्यवहार होंगे। शद्र इसी जन्ममें अपने पुरुषार्थके द्वारा सर्वोच्च मुनिदीक्षा ले सकता है। मैंने न्यायकुमुद चन्द्र ग्रन्थ (पृ० 778 ) में स्पष्ट प्रतिपादन किया है कि ___ "क्रियाविशेषयज्ञोपवीतादिचिह्नोपलक्षिते व्यक्तिविशेषे तद्व्यवस्थायाः तद्व्यवहारस्य चोपपत्तेः। तन्न भवत्कल्पितं नित्यादिस्वभावं ब्राह्मण्यं कुतश्चिदपि प्रमाणात् प्रसिध्यतीति क्रियाविशेषनिबन्धन एवायं ब्राह्मणादिव्यवहारो युक्तः।" __ अर्थात्-यह समस्त ब्राह्मणादि व्यवहार क्रियामूलक है, नित्य और जन्ममूलक ब्राह्मणत्व आदि जातिसे नहीं। भोज प्रभाचन्द्रके अकाट्य तर्कोसे अत्यन्त प्रभावित हआ और पुरोहितराजसे बोला कि-देखो, मैंने पहिले ही कहा था कि ये श्रमण अपनी आध्यात्मिक भूमिकापर समता और व्यक्तिस्वातन्त्र्यके सन्देशवाहक हैं। ये तो अत्यन्त अपरिग्रहवादी हैं / उनके जीवन में राजकारणका कोई महत्त्व नहीं है। इनका नग्नत्व स्वयं परम व्यक्तिस्वातन्त्र्य का साक्षी है। ये प्राणिमात्रके प्रति मैत्री भावना रखनेवाले हैं। अतः यदि इनने शद्रोंको दीक्षा दी है तो हमें चिन्तित होनेकी आवश्यकता नहीं है। इन्हें अपनी आध्यात्मिक समताका प्रचार करने देना चाहिए / इससे मानवजातिका समुत्थान ही होगा। भोज सपरिकर श्रमणोंको वन्दनाकर बिदा हुए / राजपुरोहितके वादकी चरचा बात ही बातमें धारानगरीमें फैल गई। आ० चतुर्मख और समस्त श्रमणसंघ हर्षविभोर हो गए। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.212032
Book TitleShraman Prabhachandra
Original Sutra AuthorN/A
Author
PublisherZ_Mahendrakumar_Jain_Nyayacharya_Smruti_Granth_012005.pdf
Publication Year
Total Pages4
LanguageHindi
ClassificationArticle & Ascetics
File Size464 KB
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