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________________ 75.00 मतलब 8.000000000000DPasc066 50.00000.00%atoboos । जन-मंगल धर्म के चार चरण शाकाहारी अण्डा : एक वंचनापूर्ण भ्रांति -आचार्य देवेन्द्रमुनि जब रसना मन से आगे बढ़ जाती है तो अनेक अनर्थ होने का तो यह प्रयास रहेगा ही कि अण्डों की खपत अधिकाधिक बढ़े। लग जाते हैं। जीभ पर नियंत्रण होना अत्यावश्यक है। कहीं तो यह । उसके उपभोक्ताओं का वर्ग और अधिक व्यापक हो। विगत कुछ अनर्गलवाणी द्वारा विग्रह खड़े कर देती है और कहीं स्वाद लोलुप | युगों से तो यह भ्रान्त धारणा विकसित की जा रही है कि अण्डे बनाकर मनुष्यों से वे कृत्य भी करवा देती है कि जो उनके लिए सामिष खाद्यों की श्रेणी में आते हैं, किन्तु सभी अण्डे ऐसे नहीं अकरणीय है। अभक्ष्य पदार्थ भी इसी कारण खाद्य सूची में स्थान होते। कुछ अण्डे निरामिष भी होते हैं, अर्थात् उनकी गणना पाने लग गये हैं। अण्डा-आहार इसका एक जीवन्त उदाहरण है। शाकाहारी पदार्थों में की जाती है। यह एक विचित्र, किन्तु असत्य अण्डा वास्तव में प्रजनन चक्र की एक अवस्था विशेष है। है, मिथ्या प्रलाप ह उनका यह मानना है कि ऐसे शाकाहारी अण्डों सन्तानोत्पत्ति लक्ष्य का यह एक साधन है, यह आहार की सामग्री का उपभोग वे लोग भी कर सकते हैं जो अहिंसा व्रतधारी हैं। ये कदापि नहीं है। प्रकृति ने इसे प्राणीजन्म के प्रयोजन से रचा है, शाकाहारी अण्डे सर्वथा सात्विक समझे जा रहे है। वस्तुतः अण्डे न प्राणियों के भोजन के लिए नहीं। यह तो मनुष्य का अनाचरण ही है तो सात्विक होते हैं, न शाकाहारी और न ही अजैव। यह तो एक कि उसने इसका यह रूप मान लिया और घोर हिंसक कृत्य में छद्मजाल है जो अण्डा व्यवसाय के विकासार्थ फेंका गया है और लिप्त हो गया है। आहार तो पोषण करता है, स्वयं शुद्ध और जिसमें अहिंसावादी वर्ग के अनेक जन उलझते जा रहे हैं। यह इन उपयोगी तत्वों से सम्पन्न होता है-अण्डे में यह लक्षण नहीं पाये व्यवसाईयों की दुरभिसंधि है। अबोध अण्डा विरोधीजन स्वयं भी जाते। यदि आहार रूप में मनुष्य अण्डे पर आश्रित हो जाए तो इस भ्रम से मुक्त नहीं हो पा रहे। वे अबोध तो यह पहचान भी नहीं उसका सारा शारीरिक विकास अवरूद्ध हो जाएगा। इसमें रखते कि कौन-सा अण्डा सामिष है और कौन-सी निरामिष कोटि कार्बोहाइड्रेड लगभग शून्य होता है। कैल्शियम और लोहा तथा का अण्डे-अण्डे तो सभी एक से होते हैं-फिर भला विक्रेता के कहDEOS आयोडीन जैसे तत्व अण्डे में नहीं होते, विटेमिन-ए की भी कमी / देने मात्र से शाकाहारी अण्डा कैसे मान लिया जाए। अपने धर्म होती है। ऐसी सामग्री चाहे खाद्य मान भी ली जाए-उसकी और मर्यादा के निर्वाह के लिए भी उसने इस समस्या पर कभी उपयोगिता क्या है? केवल अण्डे का आहार किया जाए तो दांतों, चिन्तन नहीं किया, आश्चर्य है। कुछ अण्डे शाकाहारी होते हैं, यह अस्थियों आदि का विकास और सुदृढ़ता के लिए संकट उत्पन्न हो । कहकर जनमानस को भ्रमित करने का ही षड्यन्त्र है। जाए। कोलेस्टेरोल की मात्रा अण्डे में इतनी होती है कि हृदयाघात और रक्तचाप जैसे भयावह रोग उत्पन्न हो जाते हैं। लकवा और शाकाहारी पदार्थों की पहचान : कैंसर की आशंका को भी अण्डा जन्म देता है। शरीर में नमक की शाकाहारी पदार्थ क्या होते हैं यह पहचानना दुष्कर नहीं है। मात्रा को बढ़ावा देकर यह अप्राकृतिक आहार मानव तन में नाना वनस्पतियाँ और उनके उत्पाद ही शाकाहरी श्रेणी के पदार्थ कहे जा प्रकार की समस्याएँ जागृत कर देता है। अण्डे में न तो पोषण सकते हैं। वनस्पति की उत्पत्ति मिट्टी, पानी, धूप, हवा आदि के क्षमता है और न ही यह पर्याप्त ऊर्जा का स्रोत है। प्रोटीन शरीर के सम्मिलित योगदान से होती है। कृषिजन्य पदार्थ शाकाहारी हैं। लिए एक आवश्यक तत्व है, वह अण्डे की अपेक्षा सोयाबीन, दालों । प्राकृतिक उपादानों का आश्रय पाकर ही ये पदार्थ उत्पन्न होते हैं। और अन्य शाकाहारी पदार्थों में कहीं अधिक प्राप्त होता है। अतः ये निर्दोष है, सात्विक है। दूध जैसा पदार्थ भी शाकाहार के मूंगफली में तो अण्डे की अपेक्षा ढाई गुणा (लगभग) प्रोटीन है। अन्तर्गत इसलिए मान्य है कि दुधारू पशु वनस्पति (घास-पात) ad अण्डा जितनी ऊर्जा देता है उससे लगभग तीन गुनी ऊर्जा मूंगफली । चरकर ही दूध देते हैं। अब तनिक विचार कर देखें कि क्या अण्डे से उपलब्ध हो जाती है। फिर विचारणीय प्रश्न यह है कि अण्डा भी इसी प्रकार के पदार्थ हैं, ये मिट्टी-पानी आदि से नहीं, जीवित जब ऐसा थोथा और रोगजनक पदार्थ है तो भला इसे इतना महत्व प्राणी-मुर्गी से उत्पन्न होते हैं। इनकी संरचना में मुर्गी के शरीर के क्यों दिया गया है ? उत्तर स्पष्ट है, सामान्यजन अण्डे की इस / रक्त, रस, मज्जादि का योग रहता है और उसकी उत्पत्ति भी वास्तविकता से अनभिज्ञ है। ये अज्ञजन अण्डा व्यवसाय के प्रजनन स्थान से ही होती है। अण्डों को शाकाहार फिर भला कैसे प्रचार-तंत्र के शिकार हैं। इसी कारण जो ना-कुछ है, उस अण्डे को माना जा सकता है। सभी विज्ञानी और प्रबुद्धजन अब यह मानने “सब कुछ" मान लिया गया है। लगे हैं कि शाकाहारी अण्डा जैसा कोई पदार्थ नहीं हो सकता। फलों मिथ्या प्रचार तंत्र के कारण अण्डा-महात्म्य तो इतना विकसित } और सब्जियों के साथ, एक ही दुकान पर अण्डे भी बिकते हैं। यह हो चला है कि सभी का जी इसकी ओर ललकने लगा। व्यवसाइयों । छद्म रचा गया कि सामान्यजन अण्डों को शाक या सब्जी के समान SAESSED Axoxopany 0.00 CHOUXOXO 100000000000000000000 1603RAC0.00-30000.00.00.00 ARENROERTOO.CODEGG 100% a eivateMPARDARBh05:02/ DRA900000000000000000000000000000
SR No.211987
Book TitleShakahari Anda Ek Vanchnapurna Bhranti
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDevendramuni Shastri
PublisherZ_Nahta_Bandhu_Abhinandan_Granth_012007.pdf
Publication Year
Total Pages2
LanguageHindi
ClassificationArticle & Criticism
File Size3 MB
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