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________________ । ७ ] गजरात देश में विचरण कर इन्होंने वसतिमार्ग को प्रकट श्री अभयदेवसूरि किया। जिनेश्वरसूरि के अनुक्रम में शायद तीसरे परन्तु ख्याति जिनदत्तसूरि की इसी तरह की एक और छोटी सी और महत्ता की दृष्टि से सर्वप्रथम ऐसे महान् शिष्य श्री (२१ गाथा की) प्राकृत पद्य रचना है जिसका नाम है-सुगरु अभयदेवसूरि हुए, जिन्होंने जैनागम ग्रन्थों में जो एकादशपारतन्त्र्य स्तव । इसमें जिनेश्वरसूरि की स्तवना में वे अङ्ग सूत्र ग्रन्थ हैं, इनमें से नौ अंग ( ३ से ११ ) सूत्रों पर कहते हैं कि जिनेश्वर अपने समय के युगप्रवर होकर सर्व सुविशद संस्कृत टोकाए बनाई । अभयदेवाचार्य अपनी इन सिद्धान्तों के ज्ञाता थे। जेन मत में जो शिथिलाचार रूप व्याख्याओं के कारण जैन साहित्याकाश में कल्पान्त स्थायी चोर समूह का प्रचार हो रहा था उसका उन्होंने निश्चल नक्षत्र के समान सदा प्रकाशित और सदा प्रतिष्ठित रूप में रूप से निर्दलन किया। अणहिलवाड़ में दुर्लभराज की उल्लिखित किये जायेंगे। श्वेताम्बर संप्रदाय के पिछले सभी सभा में द्रव्य लिंगी ( वेशधारी ) रूप हाथियों का सिह की गच्छ और सभी पक्ष वाले विद्वानों ने अभयदेवसूरि को बड़ी तरह विदारण कर डाला। स्वेच्छाचारी सूरियों के मतरूपी श्रद्धा और सत्यनिष्ठा के साथ एक प्रमाणभूत एवं तथ्यवादी अन्धकार का नाश करने में सूर्य के समान थे जिनेश्वरसुरि आचार्य के रूप में स्वीकृत किया है और इनके कथनों को प्रकट हुए। पूर्णतया आप्तवाक्य को कोट में समझा है। अपने समका लीन विद्वत् समाज में भी इनकी प्रतिष्ठा बहुत ऊंची थी। जिनेश्वर सूरि वे साक्षात शिष्य-प्रशिष्यों द्वारा किये गये शायद ये अपने गुरु से भी बहुत अधिक आदर के पात्र और उनके गौरव परिचयात्मक उल्लेखों से हमें यह अच्छी तरह श्रद्धा के भाजन बने थे। ज्ञात हुआ कि उनका आंतरिक व्यक्तित्व कैसा महान् था । जिनदत्तसूरि के किये गये उपयुक्त उल्लेखों में एक ऐतिहा- श्री जिनदत्तसूरि सिक घटना का हमें सूचन मिला कि उन्होंने गुजरात के अणहिलवाड़ के राजा दुर्लभराज की सभा में नामधारी जिनदत्तसूरि, जिनेश्वरसूरि के साक्षात् प्रशिष्यों में से ही एक थे। इनके दीक्षा-गुरु धर्मदेव उपाध्याय थे जो आचार्यो के साथ वाद-विवाद कर उनको पराजित किया और वहां पर वसतिवास की स्थापना की। जिनेश्वर सूरि के स्वहस्त दीक्षित अन्यान्य शिष्यों में से थे । इनका मूल दीक्षा नाम सोमचन्द्र था, हरिसिंहाचार्य ने श्रो जिनचन्द्रसूरि इनको सिद्धान्त ग्रन्थ पढ़ाये थे। इनके उत्कट विद्यानुराग जिनेश्वरसूरि के पट्टधर शिष्य जिनचन्द्रसूर हए। अपने पर प्रसन्न होकर देवभद्राचार्य ने अपना वह प्रिय कटाखरण गरु के स्वर्गवास के बाद यही उनके पट्ट पर प्रतिष्ठित (लेखनी), जिससे उन्होंने अपने बड़े-बड़े चार ग्रन्थों का लेखन हुए और गण प्रधान बने। इन्होंने अपने बहुश्रुत एवं किया था, इनको भेंट के स्वरूप में प्रदान किया था। ये विख्यात-कोति ऐसा लघु गुरु-बन्धु अभयदेवाचार्य की बड़े ज्ञानी ध्यानी और उद्यतविहारी थे। जिनवल्लभसूरि के अभ्यर्थना के वश होकर संवेगरंगशाला नामक एक स्वर्गवास के पश्चात् इनको उनके उत्तराधिकारी पद पर संवेग भाव के प्रतिपादक शांतरस प्रपूर्ण एवं वृहद प्रमाण देवभद्राचार्य ने आचार्य के रूप में स्थापित किया था। प्राकृत कथा ग्रन्थ की रचना सं० ११२५ में की। [कथाकोष प्रकरण की प्रस्तावना से] Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.211922
Book TitleVidhi marga Prakashak Jineshwarsuri aur Unki Vishishta Parampara
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJinvijay
PublisherZ_Manidhari_Jinchandrasuri_Ashtam_Shatabdi_Smruti_Granth_012019.pdf
Publication Year1971
Total Pages8
LanguageHindi
ClassificationArticle, Ascetics, Ritual, & Vidhi
File Size766 KB
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