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________________ के प्रभाव का उद्गम एवं केन्द्र स्थान था। यहीं पर सबसे जिनदत्तसूरि ने अपने पक्ष की विशिष्ट संघटना करनी पहले जिनवल्लभसूरि के नये उपासक भक्त बने और शुरू की। जिनेश्वरसरि प्रतिपादित कुछ मौलिक मन्तव्यों यहीं पर इनके पक्ष का सबसे पहिला वीर विधि चैत्य नामक का आश्रय लेकर और कुछ जिनवल्लभसरि के उपदिष्ट विशाल जेन मन्दिर बना। वि० सं० ११६७ के आषाढ़ विचारों को पल्लवित कर इन्होंने जिनवल्लभ द्वारा स्थापित मास में इनको इसी मन्दिर में आचार्य पद पर प्रतिष्ठित उक्त विधिपक्ष नामक संघ का बलवान और नियमबद्ध कर देवभद्राचार्य ने अपने गच्छपति गुरु प्रपन्नचन्द्रसूरि के संगठन किया जिसकी परम्परा का प्रवाह आठ सौ बर्ष उस अन्तिम आदेश को सफल किया। पर दुर्भाग्य से ये पूरे हो जाने पर भी अखण्डित रूप से चलता है। इस पद का दीर्घकाल तक उपभोग नहीं कर सके । चार जिनदत्तसूरि ने प्राकृत, संस्कृत और अपभ्रंश भाषा में ही महीने के अन्दर इनका उसी चित्तौड़ में स्वर्गवास छोटे-बड़े अनेक ग्रन्थों की रचना को। इनमें एक गणधरहो गया। इस घटना को जानकर देवभद्राचार्य को सार्द्धशतक नामक नथ है जिसमें इन्होंने भगवान महावीर बड़ा दुःख हुआ। के शिष्य गणधर गौतम से लेकर अपने गच्छपति गरु जिनवजिनदक्तसूरि ल्लभसुरि तक के महावार के शासन में होने वाले और अपनी जिनवल्लभसूरि ने अपने प्रभाव से मारवाड़, मेवाड़, संप्रदाय परंपरा में माने जाने वाले प्रधान-प्रधान गणधारी मालवा, बागड़ आदि देशों में जो सैकड़ों ही नये भक्त आचार्यों की स्तुति की है। उन्होंने १५० गाथा के प्रकरण में उपासक बनाये थे और अपने पक्ष के अनेक विधि-चैत्य आदि की ६२ गाथाओं तक में तो पूर्वकाल में हो जाने वाले स्थापित किये थे। उनका नियामक ऐसा कोई समर्थ गच्छ- कितने पूर्वावार्यों की प्रशंसा की है। ६३ से लेकर ८४ तक नायक यदि न रहा तो वह पक्ष छिन्न-भिन्न हो जायगा की गाथाओं में वर्द्धमानसूरि और उनके शिष्यसमूह में होने और इस तरह जिनवल्लभसूरि का किया हुआ कार्य विफल वाले जिनेश्वर, बुद्धिसागर, जिनचन्द्र, अभयदेव, देवभद्रादि हो जायगा, यह सोच कर देवभद्राचार्य, जिनवल्लभसूरि अपने निकट पूर्वज गुरुओं की स्तुति की है। ८५वीं गाथा के पट्ट पर प्रतिष्ठित करने के लिए अपने सारे समुदाय से लेकर १४७ तक की गाथाओं में अपने गण के स्थापक में से किसी योग्य व्यक्तित्व वाले यतिजन की खोज करने गुरु जिनवल्लभ को बहुत ही प्रौढ़ शब्दों में तरह-तरह से लगे। उनकी दृष्टि धर्मदेव उपाध्याय के शिष्य पंडित स्तवना की है। जिनेश्वरसूरि के गुणवर्णन में इन्होंने इस सोमचन्द्र पर पड़ी जो इस पद के सर्वथा योग्य एवं जिन- ग्रन्थ में लिखा है कि वर्द्धमानसूरि के चरणकमलों में श्रमर वल्लभ के जैसे ही पुरुषार्थी, प्रतिभाशाली, क्रियाशील के समान सेवारसिक जिनेश्वररारि हुए वे सब प्रकार के प्रमों और निर्भय प्राणवान व्यक्ति थे। देवभद्राचार्य फिर चित्तौड़ से रहित थे अर्थात् अपने विचारों में निम थे, स्वरमय गए और वहां पर जिनवल्लभसूरि के प्रधान-प्रधान उपासकों और पर समय के पदार्थ सार्थ का विस्तार करने में समर्थ थे। के साथ परामर्श कर उनकी सम्मति से सं० ११६६ के इन्होंने अणहिलवाड़ में दुर्लभराज की सभा में प्रवेश करके वैशाख मास में सोमचन्द्र गणि को आचार्य पद देकर नामधारी आचार्यों के साथ निर्विकार भाव से शास्त्रीय जिनदत्तसूरि के नाम से जिनवल्लभसूरि के उत्तराधिकारी विचार किया और साधुओं के लिये वसति-निवास को आचार्य पद पर उन्हें प्रतिष्ठित किया। जिनबल्लभसूरि स्थापना कर अपने पक्ष का स्थापन किया। जहां पर गुरुके विशाल उपासक वृन्द का नायकत्व प्राप्त करते ही क्रमागत सद्वार्ता का नाम भी नहीं सुना जाता था, उस Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.211922
Book TitleVidhi marga Prakashak Jineshwarsuri aur Unki Vishishta Parampara
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJinvijay
PublisherZ_Manidhari_Jinchandrasuri_Ashtam_Shatabdi_Smruti_Granth_012019.pdf
Publication Year1971
Total Pages8
LanguageHindi
ClassificationArticle, Ascetics, Ritual, & Vidhi
File Size766 KB
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