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________________ वर्तमान समय में जैन सिद्धांतों की उपादेयता / २०५ भी सन्देह नहीं कि उसका अन्यान्य राष्ट्राध्यक्षों पर बहुत बड़ा प्रभाव पड़ेगा । अहिंसा से ही विश्वमैत्री तथा समता फलित होती है। विश्वमैत्री भाषणों, वार्तालापों और प्रायोजनों से कभी फलित नहीं होती। उसे लाने हेतु अहिंसा को जीवन में उतारना ही होगा । भगवान् महावीर ने अहिंसा को विज्ञान बतलाया, जिसका प्राशय यह था कि अहिंसा को सूक्ष्मता, गहनता तथा व्यापकता के साथ जानना वास्तव में बहत बड़ी उपलब्धि है। वैयक्तिक, पारिवारिक सामाजिक, राष्ट्रीय तथा अन्तर्राष्ट्रीय-सभी क्षेत्रों में अहिंसा की अपरिहार्य आवश्यकता है। जैन धर्म के अनुसार अहिंसा कायरों का सिद्धान्त नहीं है, वह वीरों का धर्म है। अहिंसा को जीवन में उतारने के लिए बहुत बड़ी प्रात्म-शक्ति की आवश्यकता है ।। अहिंसा की तरह जैनधर्म का एक दूसरा महत्त्वपूर्ण सिद्धान्त अनेकांत दर्शन है। जीवन में हम प्रत्यक्ष रूप में जो संघर्ष, द्वन्द्व, कलह तथा शत्रुभाव देख रहे हैं, उसका मूल मनुष्य के विचारों में उत्पन्न होता है। विचार वस्तुतत्त्व की समझ पर निर्भर करते हैं । यदि समझ में प्राग्रह बुद्धि या ऐकान्तिक पकड़ होगी तो व्यक्ति जड़ बनेगा । फलत: वह सत्य के बहुआयामी स्वरूप को यथावत् रूप में पकड़ ही नहीं सकेगा और न उसे प्रतिपादित ही कर सकेगा । अक्सर होता ऐसा ही है, लोग किसी वस्तु या तत्त्व के एक ही पक्ष को दुराग्रह या जड़ता के साथ गृहीत कर लेते हैं और एकमात्र उसे ही यथार्थ मानते हैं। जो वैसा नहीं स्वीकारता या नहीं बोलता, उसे लोग गलत मानने लगते हैं। यहीं से संघर्ष का दौर शुरू होता है, जो आगे चलकर शतशाखी, सहस्रशाखी वटवृक्ष की तरह उत्तरोत्तर बढ़ता ही जाता है । वास्तव में सत्य अनुभूति का विषय है, वह समग्रता से एक साथ कहा नहीं जा सकता। जब वह वचन का विषय बनता है तो उसे भिन्न-भिन्न रूप में भिन्न-भिन्न वचनों द्वारा निरूपित करना होता है । आपेक्षिक निरूपण एकान्त नहीं होता है, वह अनेकान्त होता है, उस निरूपण की वचन-पद्धति को स्याद्वाद कहते हैं । अनेकान्तवाद या स्याद्वाद विश्व को जैनदर्शन की अद्भत देन है। आज का युग, जिसमें असहिष्णुता, कटुता, पास्परिक प्रसद्भाव आदि व्यापक रुप में फैलते जा रहे हैं, जिनका परिणाम संघर्ष, हिंसा, रक्तपात के रूप में प्रकट होता है। यदि विचार में अनेकान्त-तत्त्व को स्वीकार कर लें तो ये सब स्थितियाँ जिन्हें मानवता का अभिशाप कहा जा सकता है, स्वयं समाप्त हो जाएँ। विरोध और झगड़े का मुख्य कारण असहिष्णुता है । असहिष्णुता की आधारभूमि दुराग्रह है। अनेकान्त के पाते ही तत्काल असहिष्णुता तथा दुराग्रह का उन्मूलन हो जाता है। इससे वैचारिक सहिष्णुता, सौम्यता तथा सद्व्यवहार का वातावरण बनता है। लोक-जीवन में जो अशान्ति व्याप्त है, उसका एक कारण परिग्रह है, परिग्रह का अर्थ धन, सम्पत्ति, वैभव, साधन-सामग्री और इन सब में आसक्ति है । मनुष्य की यह कितनी बड़ी दुर्बलता है कि वह बहुत कुछ प्राप्त कर लेने पर भी सन्तोष नहीं कर पाता । जिस प्रकार आकाश का अन्त नहीं होता, उसी प्रकार उसकी इच्छाएँ भी अनन्त हैं । ज्यों ज्यों मनुष्य के पास धन-दौलत प्राता जाता है, उसकी आकांक्षाएँ और अधिक बढती जाती हैं। वह उनमें लिप्त व मूछित होता जाता है । शास्त्रकार ने मूर्छा को परिग्रह कहा है । मूर्खा एक प्रकार की बेहोशी है, मादकद्रव्य का सेवन कर व्यक्ति अपना होश-हवास खो बैठता है, उसी प्रकार परिग्रहजनित मूर्छा या धन, वैभव के नशे में भी मनुष्य की वैसी ही स्थिति होतो है । जैनधर्म परिग्रह को पाप का मूल मानता है, क्योंकि ज्यों ही मनुष्य धन-दौलत के लोभ में फंस जाता है, वह पाप-पुण्य, धम्मो दीवो संसार समुच में चर्म ही दीय Jain Education International For Private & Personal Use Only
SR No.211896
Book TitleVartaman Samay me jain Siddhanto ki Upadeyta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorVinaykumar
PublisherZ_Umravkunvarji_Diksha_Swarna_Jayanti_Smruti_Granth_012035.pdf
Publication Year1988
Total Pages3
LanguageHindi
ClassificationArticle & Society
File Size386 KB
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