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________________ करानेका उल्लेख बडे गौरवके साथ अमर सागर स्थित जैन मन्दिरमें उत्कीर्ण वि० सं० १८९२ के अभिलेखमें किया गया है। राजस्थानमें अगणित ज्ञात एवं अज्ञात ग्रन्थ भण्डार हैं। उनमें संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंश, हिन्दी, राजस्थानी, बंगला, मराठी, उर्दू, फारसी, अरबी आदि भाषाओंमें विरचित ताडपत्रीय एवं कागज पर लिखे ग्रन्थ उपलब्ध हैं। इनमें विषयकी विविधता भी कम रोचक नहीं है। वेद, उपनिषद्, इतिहास, पुराण, काव्य, व्याकरण, धर्म, ज्योतिष, संगीत, वैद्य कके साथ ही साथ साहित्यिक, ऐतिहासिक, अर्धऐतिहासिक विषयों (यथा प्रशस्तियों, ख्यात-वात, रासो, वंशावली आदि) का भी प्रणयन हुआ। इनमें अनेक ग्रन्थ सचित्र हैं और उनमें आलेखित अपभ्रंश, मगल तथा राजस्थानी चित्रशैलीकी जो अनपम कलात्मक ॥ राजस्थानी चित्रशैलीकी जो अनुपम कलात्मक धरोहर सुरक्षित है, वह चित्रकलाके इतिहासकी परम्पराके अध्ययनकी दृष्टिसे बहुत ही महत्वपूर्ण है। इन हस्तलिखित ग्रन्थोंको सुरक्षित रखने हेत बनी सचित्र काष्ठ पट्रिकायें, वस्त्र, बन्धन आदि भी कम रोचक नही हैं। जैन आचार्योंको चातुर्मास व्यतीत करनेके लिये विभिन्न संघों द्वारा प्रेषित लम्बे-लम्बे सचित्र निमंत्रणपत्र अथवा विज्ञप्ति पत्र एवं धार्मिक भण्डारोंको चित्रित करनेवाले कपड़े पर बने पटचित्र भी इन ज्ञान भण्डारोंकी विधियाँ हैं । जैसलमेर किलेके संभवनाथ जैन मन्दिर में स्थित श्री जिनभद्रसरि ज्ञान भण्डार, राजस्थानका ही नहीं, समूचे भारतका हस्तलिखित ग्रन्थोंका महत्वपूर्ण और विशाल संग्रह है। आचार्य जिनभद्रसूरि द्वारा पन्द्रहवीं शताब्दीके अन्तिम चरणमें इस भण्डारकी स्थापना की गई थी। इनकी प्रेरणासे जैसलमेर, जावाल, देवगिरि, अहिपुर (अहोर), पाटण (गुजरात) में उपदर्ग, आशापल्ली तथा खंभातमें भी इसी प्रकारके जैन ग्रन्थ भण्डार स्थापित हुए। जैसलमेर ग्रन्थ भण्डारके अनेक ताड़पत्रीय ग्रन्थोंका लेखन इन्हीं आचार्यश्रीके उपदेशसे खंभात निवासी धरणाशाह एवं श्रेष्ठी भ्रातयगल उदयराज और वलिराजने करवाया। इस भण्डारसे धरणाशाह द्वारा लिखवाये ४८ ताडपत्रीय ग्रन्थ, आज भी विद्यमान हैं। यहाँ कुल ४०३ ताड़पत्रीय ग्रन्थोंका महत्वपूर्ण संग्रह है जिनमें लगभग ७५० ग्रन्थोंका संकलन है। इनमें प्राचीनतम ताड़पत्रीयग्रन्थ जिनभद्रगणि क्षमाश्रमण द्वारा विरचित विशेषावश्यकमहाभाष्य (ग्रन्थ सं० ११६) हे जा १०वीं शताब्दी पूर्वार्द्धका है। यही वि० सं० १११७ में द्रोणाचार्य रचित ओघनिर्यक्तिवत्ति (ग्रन्थ सं० ८४।१) तथा आचार्य हरिभद्रकृत दशवैकालिकसूत्रवृत्ति (ग्रन्थ सं० ८४।२) की प्रतिलिपियाँ पाहिल द्वारा ताड़पत्र पर की गई जिनमें चित्र भी आलेखित हैं जो चित्रकलाके क्रमिक विकासके अध्ययनकी दृष्टिसे बहुत ही महत्वपूर्ण हैं । ओधनियुक्ति में हाथी और कमल चित्रित हैं। तथा दशवकालिक सूत्रमें पूर्णकलश, हस्ती, सिंह, कमलासना देवी तथा गतिमान धनुर्धारीका अंकन है। ये ग्रन्थ गुजरातसे लाकर जेसलमेर ग्रन्थ भण्डारमें सुरक्षित किये गये। इनमें अनेक दुर्लभ व अलभ्य ग्रन्थ हैं। कागज पर लिखे गये १७०४ ग्रन्थ यहाँ सुरक्षित हैं जिनमें वि० सं० १२४६ में लिखित कर्मग्रन्थ टिप्पण प्राचीनतम है। कौटिल्यके अर्थशास्त्रकी चौदहवीं शताब्दीकी एक वृत्ति (ग्रन्थ सं० ३९८) यहाँ विद्यमान है जो अन्यत्र अनुपलब्ध है। तथैव, बौद्धधर्मके अनेक ताडपत्रीय ऐसे ग्रन्थ इस संग्रहमें है जो अभी तक अलभ्य थे। इनमें उल्लेखनीय दिग्नाग रचित न्यायप्रवेश (११४६ ई०) तथा नालन्दा विश्वविद्यालयके प्रधान कमलशीलकृत तत्त्वसंग्रह (१२वीं शताब्दी) टीका सहित प्रमुख है। अनेक काव्य ग्रन्थोंकी प्राचीन प्रतियाँ भी यहाँ उपलब्ध हैं । इनमें धनपालकृत तिलकमंजरी (१०७३ ई०), भोजकृत शृंगारमंजरी (११वीं शताब्दी), उद्योतन सूरिकृत कुवलयमालाकथा (१०८२ ई०) सुबन्धकृत वासवदत्ता, (११५० ई०), जिनचन्द सूरिकृत सम्वेग रंगशाला (११५० ई०) आदि मुख्य हैं । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.211830
Book TitleRajasthan ki Pura Sampada ke Khajane Prachin Jain Pandulipiya
Original Sutra AuthorN/A
AuthorVijayashankar Shrivastava
PublisherZ_Kailashchandra_Shastri_Abhinandan_Granth_012048.pdf
Publication Year1980
Total Pages3
LanguageHindi
ClassificationArticle & Literature
File Size437 KB
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