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________________ महोपाध्याय क्षमाकल्याण गणि की संस्कृत साहित्य-साधना ____ डॉ० दिवाकर शर्मा, एम० ए०, पी०-एच० डी० बीकानेर मण्डलको अपनी विद्वत्ताकी सत्कीर्तिसे समस्त भारतमें प्रख्यात कर देनेवाले महोपाध्याय समाकल्याण गणि अपने समयके जैन एवं जैनेतर विद्वानोंमें एक अग्रगण्य साहित्य-साधक माने जा सकते हैं । साहित्य-रचनाके साथ आप शास्त्रार्थके लिए भी सदैव कटिबद्ध रहते थे। आपकी इस शास्त्रार्थ-शा संस्कृत भाषणपर आपके इस असामान्य अधिकारका वर्णन करते हुए क्षमाकल्याणचरितकार कहते हैं कि क्षमाकल्याण सिंहके समान संस्कृतमें गर्जन करते हुए अपने प्रतिपक्षी पण्डितको इस रीतिसे परास्त कर दिया करते थे जैसे कि कोई दहाड़ता हुआ शेर उद्दण्ड शुण्डवाले हाथीको तत्काल पछाड़ देता है। निर्मर्षणः सिंह इवोन्मुखः क्षमाकल्याणकः संस्कृत-गजितं दधत् । उद्दण्डशुण्डारमिवाशु पण्डितं सम्यग्विजिग्येऽस्खलितोरुयुक्तिभिः ।। आपका जन्म बीकानेर मण्डलके केसरदेसर नामक स्थानपर विक्रम संवत् १८०१को हुआ था। आप ओशवंशमें मालगोत्रके थे। जन्मसे ही वैराग्यमें रुचि होनेके कारण आपने ११ वर्षकी अल्पायुमें ही पूज्येश्वर श्री अमृतधामजीसे विक्रम संवत् १८१२में पारमेश्वरी प्रव्रज्या स्वीकार कर ली थी।२ म० म० श्री रत्नसोमजी तथा उपाध्याय श्री रामविजयजी आपके गुरु थे। दीक्षा-प्राप्तिके पश्चात् आपने राजस्थान, गुजरात, मध्यप्रदेश, बिहार, विदर्भ एवं उत्तरप्रदेशादिका भ्रमण किया। आपने यतिधर्म स्वीकार करते ही सरस्वतीकी आराधना प्रारम्भ कर दी थी जिसके फलस्वरूप आपने राजस्थानी, प्राकृत एवं संस्कृतकी सैकड़ों लघु एवं बृहद् साहित्यिक रचनाओंका निर्माण किया। साहित्यरचनाके अतिरिक्त आपने देवप्रतिष्ठा और उद्यापनादि अनेक धार्मिक कार्य करवाये। जीवनचरित सम्बन्धी सामग्रीसे यह भी ज्ञात होता है कि आपका बीकानेर, जैसलमेर व जोधपुरके राजाओं द्वारा सम्मान किया गया था। गुरु परम्परा आपके गुरुजन भी धार्मिक सिद्धान्तोंके प्रसिद्ध व्याख्याता थे। आपने अपनी कृतियोंकी अन्तिम पुष्पिकामें और ऐतिहासिक महत्त्वकी स्वरचित खरतरगच्छ पट्टावलीको प्रशस्तिमें गुरुपरम्पराका उल्लेख निम्न प्रकारसे किया है। १. ग्रामाग्रिमे केसरदेसराह्वये भूखाष्टभूमोमितविक्रमाब्दके ( १८०१) __ श्री ओशवंशे किल मालुगोत्रे जन्म प्रपेदे स मुनिः शुभेऽह्नि ।।--क्षमाकल्याणचरितम् २. दृगभूमिवस्विन्दुमितेऽथ वत्सरे (१८१२) वैराग्यमाजन्मत एव धारयन् । धर्मामृतस्नानविवृद्धलालसे दीक्षां सिषेवेऽमृतधर्मसूरितः ।।--क्षमाकल्याणचरितम् ३. श्रीमंतो जिनभक्तिसूरिगवश्चांद्रे कूले जज्ञिरे तच्छिष्या जिनलाभसूरिमुनयः श्री ज्ञानतः सागराः । तच्छिष्याऽमृतधर्मवाचकवरास्तेषां विनेयः क्षमाकल्याण: स्वपरोपकारविधयेऽकाषिदिमां वृत्तिकाम् ।। १४६ : अगरचन्द नाहटा अभिनन्दन-ग्रन्थ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.211701
Book TitleKshamakalyan Gani ki Sanskruti Sathiya Sadhna
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDiwakar Sharma
PublisherZ_Nahta_Bandhu_Abhinandan_Granth_012007.pdf
Publication Year
Total Pages6
LanguageHindi
ClassificationArticle & Literature
File Size638 KB
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