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________________ ११२ जैन विद्या के आयाम खण्ड-६ वह अन्य सभी द्रव्यों के पर्याय परिवर्तन में निमित्त का कारण बनकर क्षमता को बनाया है। कार्य करता है। पुन: यदि काल द्रव्य में ध्रौव्यत्व का अभाव मानेंगे तो जैनों के अनुसार उत्सर्पिणी काल में क्रमश: विकास और उसका द्रव्यत्व समाप्त हो जायेगा। अत: उसे स्वतन्त्र द्रव्य मानने पर अवसर्पिणी काल में क्रमश: पतन होता है। ज्ञातव्य है कि कालचक्र का उसमें उत्पाद-व्यय के साथ-साथ ध्रौव्यत्व भी मानना होगा। प्रवर्तन जंबूद्वीप के भरत क्षेत्र आदि कुछ विभागों में ही होता है। इस प्रकार पाँच अस्तिकाय द्रव्यों एवं एक अनस्तिकाय द्रव्य कालचक्र का विवेचन करने के पश्चात् आत्मा एवं पुद्गल द्रव्य तथा उनके अर्धमागधी आगम साहित्य में काल की चर्चा उत्सर्पिणी पारस्परिक सम्बन्ध को समझना आवश्यक है। काल और अवसर्पिणी काल के रूप में भी उपलब्ध होती है। इनमें प्रत्येक के छह-छह विभाग किये जाते हैं, जिन्हें आरे कहा जाता है। ये सन्दर्भछह आरे निम्न हैं-१. सुषमा-सुषमा, २. सुषमा, ३. सुषमा-दुषमा, ४. 1. See J.C. Sikdar, Concept of Matter in Jaina Philosoदुषमा-सुषमा, ५. दुषमा और ६. दुषमा-दुषमा। उत्सर्पिणी काल में phy,. P.V. Research Institute, Varanasi-5 इनका क्रम विपरीत होता है। अवसर्पिणी और उत्सर्पिणी काल मिलकर 2. उद्धृत Jain Conceptions of Space and Time by Nagin एक कालचक्र पूरा होता है। जैनों की कालचक्र की यह कल्पना बौद्ध J. Shah, p. 374, Ref. No. 6, Studies in Jainism, Deptt. और हिन्दू कालचक्र की कल्पना से भिन्न है। किन्तु इन सभी में इस . of Philosophy, University of Poona, 1994. बात को लेकर समानता है कि इन सभी में कालचक्र के विभाजन का 3. जैनेन्द्र सिद्धान्त कोश, भाग-२, पृ० ८४,८७. आधार सुख-दुःख एवं मनुष्य के नैतिक एवं आध्यात्मिक विकास की ४. Studies in Jainism, Ed. M.P. Marathe, P. 69. महावीरकालीन विभिन्न आत्मवाद एवं जैन आत्मवाद का वैशिष्ट्य धर्म और नैतिकता आत्मा सम्बन्धी दार्शनिक मान्यताओं पर औपनिषदिक साहित्य है, जिसमें आत्मवाद सम्बन्धी विभिन्न परिकल्पनायें, अधिष्ठित रहते हैं। किसी भी धर्म एवं उसकी नैतिक विचारणा को किसी एक आत्मवादी सिद्धान्त के विकास के निमित्त संकलित की जा उसके आत्मा सम्बन्धी सिद्धान्त के अभाव में समुचित रूप से नहीं रही थीं। उपनिषदों का आत्मवाद विभिन्न श्रमण परम्पराओं के आत्मवादी समझा जा सकता। महावीर के धर्म एवं नैतिक सिद्धान्तों के औचित्य- सिद्धान्तों से स्पष्ट रूप से प्रभावित है। उपनिषदों में आत्मासम्बन्धी स्थापन के पूर्व उनके आत्मवाद का औचित्य-स्थापन आवश्यक है। परस्पर विपरीत धारणायें जिस बीज रूप में विद्यमान हैं वे इस तथ्य साथ ही महावीर के आत्मवाद को समझने के लिये उनके समकालीन की पुष्टि में सबल प्रमाण हैं। हाँ, इन विभिन्न आत्मवादों को ब्रह्म की विभिन्न आत्मवादों का समालोचनात्मक अध्ययन भी आवश्यक है। धारणा में संयोजित करने का प्रयास उनका अपना मौलिक है। यद्यपि भारतीय आत्मवादों के सम्बन्ध में वर्तमान युग में श्री लेकिन यह मान लेना कि महावीर अथवा बुद्ध के समकालीन ए.सी. मुकर्जी ने अपनी पुस्तक "The Nature of Self' एवं श्री विचारकों में आत्मासम्बन्धी दार्शनिक सिद्धान्त थे ही नहीं, यह एक एस.के. सक्सेना ने अपनी पुस्तक "Nature of Consciousness in भ्रान्त धारणा है। Hindu Philosophy" में विचार किया है लेकिन उन्होंने महावीर के मेरी यह स्पष्ट धारणा है कि महावीर के समकालीन विभिन्न समकालीन आत्मवादों पर समुचित रूप से कोई विचार नहीं किया है। विचारकों की आत्मवाद सम्बन्धी विभिन्न धारणायें विद्यमान थीं। कोई श्री धर्मानन्द कौशाम्बीजी द्वारा अपनी पुस्तक "भगवान बुद्ध" में यद्यपि उसे सूक्ष्म कहता था, तो कोई उसे विभु। किसी के अनुसार आत्मा इस प्रकार का एक लघु प्रयास अवश्य है फिर भी इस सम्बन्ध में एक नित्य थी, तो कोई उसे क्षणिक मानता था। कुछ विचारक उसे (आत्मा व्यवस्थित अध्ययन आवश्यक है। को) कर्ता मानते थे, तो कुछ उसे निष्क्रिय एवं कूटस्थ मानते थे। इन्हीं पाश्चात्य एवं कुछ आधुनिक भारतीय विचारकों की यह विभिन्न आत्मवादों की अपूर्णता एवं नैतिक व्यवस्था को प्रस्तुत करने मान्यता है कि महावीर एवं बुद्ध के समकालीन विचारकों में आत्मवाद- की अक्षमताओं के कारण ही तीन नये विचार सामने आये- एक ओर सम्बन्धी कोई निश्चित दर्शन नहीं था। तत्कालीन सभी ब्राह्मण और था उपनिषदों का सर्व-आत्मवाद या ब्रह्मवाद, दूसरी ओर था बुद्ध का श्रमण मतवाद केवल नैतिक-विचारणाओं एवं कर्मकाण्डीय-व्यवस्थाओं अनात्मवाद और तीसरी विचारणा थी जैन आत्मवाद की, जिसने इन को प्रस्तुत करते थे। सम्भवत: इस धारणा का आधार तत्कालीन विभिन्न आत्मवादों को एक जगह समन्वित करने का प्रयास किया। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.211670
Book TitleMahavir kalin Vibhinna Atmavad evam jain Atmavad ka Vaishishtya
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSagarmal Jain
PublisherZ_Shwetambar_Sthanakvasi_Jain_Sabha_Hirak_Jayanti_Granth_012052.pdf
Publication Year1998
Total Pages9
LanguageHindi
ClassificationArticle & Soul
File Size735 KB
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