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________________ सोपान के रूप में स्वीकार नहीं करते। उनके मानसिक अभ्युन्नति का तृतीय स्तर बलादृष्टि है। अनुसार यमों की साधना न तो नियमों के पालन बलादृष्टि का तात्पर्य है मन में दृढ़ता। हरिभद्र - के लिए साधक में योग्यता उत्पन्न करती है, और सूरि के अनुसार इसकी प्राप्ति आसन साधना से न वे ऐसा ही संकेत करते हैं कि नियमों के पालन होती है। तत्त्वदर्शन में दृढ़ता, तत्त्वश्रवण की उत्कट के पूर्व यमों के पालन में सिद्धि अनिवार्य है। और अभिलाषा मानसिक, दृढता के फलस्वरूप विक्षेपों इनमें सिद्धि के बाद ही आसन साधना की जा का अभाव. लौकिक जीवन के साथ ही पारलौकिक सकेगी। वस्तुतः वे इन्हें (यमों और नियमों को) जीवन में भी प्रणिधान, समस्त कर्मफलों का नाश योग साधना में अन्त तक आवश्यक मानते हैं। और निर्बाध प्रगति होने से अभ्युदय की प्राप्ति में इसी कारण वे हिंसा आदि के मूल में लोभ, मोह पूर्ण विश्वास बलादृष्टि की स्थिति में मन में विद्य और क्रोध का संकेत करके अहिंसा आदि के पालन मान रहते हैं ।18 योगसूत्रकार पतञ्जलि यद्यपि में इन लोभ आदि की निवृत्ति अनिवार्य मानते हैं, आसन साधना के फलस्वरूप क्षुधा-पिपासा, शीतऔर इनकी पूर्णतया निवृत्ति प्रत्याहार सिद्धि के ताप आदि द्वन्द्वों से अनभिघात और उसके फलबाद ही हो सकती है उससे पूर्व नहीं। साथ ही वे स्वरूप प्राणायाम करने की योग्यता की उपलब्धि नियमों में अन्यतम ईश्वर प्रणिधान को समाधि, को ही आसन साधना का फल स्वीकार करते हैं, अर्थात् चित्त की पूर्ण एकाग्रता के प्रति योग साधना किन्तु आसन के अंग के रूप में अनन्त समापत्ति की के अन्तिम अंग के प्रति कारण मानते हैं । यह भी साधना से प्राप्त द्वन्द्वों से मुक्ति के फलस्वरूप मन स्मरणीय है कि पतञ्जलि आसनों को प्राणायाम में जिस दृढता का उदय होता है। और उसके के लिए योग्यता प्राप्त करने में, प्राणायाम को फलस्वरूप जो प्रणिधान सिद्ध होता है उसके कारण धारणा की योग्यता प्राप्त करने में कारण मानते शभ आध्यात्मिक फलों का सहज भाव से मन में हैं और इस तथ्य का स्पष्ट निर्देश भी “तस्मिन्सति दर्शन मन की एक विशेष स्थिति है जिसका विवरण श्वास प्रश्वासयोः गति विच्छेदः प्राणायामः ।" ततः आचार्य हरिभद्र सूरि के अतिरिक्त किसी आचार्य ने क्षीयते प्रकाशावरणम्, धारणासु च योग्यतामनसः। नहीं किया है। सूत्रों द्वारा करते हैं। इनके अतिरिक्त वे यह भी मन की चतुर्थ अभ्युन्नत स्थिति साधना पथ स्वीकार करते हैं कि आसन, प्राणायाम और प्रत्या- का पूर्वार्ध पार करने पर होती है। दूसरे शब्दों में हार ये प्रथम तीन धारणा आदि तीन की दृष्टि से हम कह सकते हैं कि इस अवस्था में साधक सामान्य बहिरंग है ।16 एक प्रकार से साधना है। तथा मानव न रहकर असामान्य हो जाता है, अलौकिक धारणा आदि तीन चित्त की एकाग्रता की तीन भाव को प्राप्त कर लेता है। अतएव वह मानव स्थितियाँ भी निर्वीज समाधि के प्रति बहिरंग है। सामान्य में रहने वाले बोध की अवस्था बुद्धि और अर्थात् उनमें भी साध्य साधन भाव है। किन्तु यम ज्ञान के बाद असम्मोह की अवस्था में पहुँच जाता 710 नियमों के सम्बन्धों में वे ऐसा संकेत नहीं करते है। असम्मोह को इस अवस्था में ज्ञान के सभी पक्ष हैं । तीन, तीन के दो वर्ग बनाते हुए अर्थात् प्रथम ज्ञाता को विदित होते हैं । जैन दर्शन में स्वीकृत वर्ग की साधना की स्थूलता एवं द्वितीय वर्ग की सप्तभंगी नय के अनुसार किसी पदार्थ के भिन्नसाधना की सूक्ष्मता की ओर संकेत करते समय भी भिन्न दृष्टियों से जितने विकल्पात्मक स्वरूप हो वें इन दोनों को किसी वर्ग में सम्मिलित नहीं सकते हैं, उन सभी स्वरूपों का उसे यथार्थबोध PAK करते। रहता है, फलस्वरूप उसके चित्त में संकल्प की कोई - साधना के परिणामस्वरूप प्राप्त होने वाली सम्भावना नहीं रहती। इसी कारण लौकिक जीवन X|| ततीय खण्ड : धर्म तथा दर्शन २३७ Od0 साध्वीरत्न कुसुमवती अभिनन्दन ग्रन्थ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.211567
Book TitleBharatiya Yoga Parampara me Jain Acharyo ke Yogadan ka Mulyankan
Original Sutra AuthorN/A
AuthorBramhamitra Avasthi
PublisherZ_Kusumvati_Sadhvi_Abhinandan_Granth_012032.pdf
Publication Year1990
Total Pages9
LanguageHindi
ClassificationArticle & Yoga
File Size2 MB
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