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________________ आचार्य - यतीन्द्रसूरि स्मारकग्रन्य - जैन आगम एवं साहित्य २. नयचक्र, ३. आलापपद्धति, ४. श्रुतभवनदीपक, ५. तत्त्वसार, -धर्मसेन के शिष्य शन्तिषेण, शान्तिषेण के गोपसेन, गोपसेन के ६. आराधना, ७ धर्मसंग्रह। भावसेन और भावसेन के शिष्य जयसेन थे। इन्होंने अपने वंश __ को योगीन्द्रवंश कहा है। इनके एकमात्र ग्रन्थ धर्मरत्नाकर में अमितगति प्रथम - ये देवसेन के शिष्य और नेमिषेण के पुरुषार्थसिद्धयुपाय के १२५ पद्य उद्धृत हैं। आचार्य सोमदेवसूरि गुरु थे। इनके साथ त्यक्तनिःशेषसङ्ग विशेषण प्राप्त होता है। के उपासकाध्ययन के भी अनेक पद्य इन्होंने उद्धृत किए हैं। इनका समय विक्रम सं. १००० माना जाता है। इनकी एकमात्र एक पद्य रामसेन के तत्त्वानुशासन का भी उद्धृत है । धर्मरत्नाकर कृति योगसार प्राभृत मानी जाती है। में उसका रचनाकाल विक्रम संवत् १०५५ दिया गया है। अमितगति द्वितीय - अमितगति की शिष्य परंपरा का ज्ञान जयसेन (द्वितीय) - आचार्य जयसेन कुन्दकुन्द के अमरकीर्ति के 'छक्कम्मोवएस' से होता है। इस ग्रन्थ के अनुसार समयसार, प्रवचनसार और पंचास्तिकाय ग्रन्थों के सुप्रसिद्ध अमितगति (प्रथम) शान्तितिसेण अमरसेन (द्वितीय) श्रीसेन, टीकाकार हैं। इनके गुरु का नाम सोमसेन और दादागुरु का नाम चन्द्रकीर्ति और अमरकीर्ति इस प्रकार गुरु-शिष्य परंपरा प्राप्त वीरसेन था। इन्होंने त्रिभुवनचन्द्र गुरु को भी नमस्कार किया है। होती है। अमितगति द्वितीय का काल विक्रम संवत् की ११वीं विद्वानों ने इनका समय ग्यारहवीं शताब्दी का उत्तरार्द्ध या बारहवीं शताब्दी माना जाता है। इनकी रचनाएँ निम्नलिखित हैं - शताब्दी का पूर्वार्द्ध माना है। इनकी टीकाओं की शैली आचार्य १. धर्मपरीक्षा, २. सुभाषितरत्नसन्दोह, ३. उपासकाचार, अमतचन्द्र से भिन्न है। प्रत्येक गाथा के पदों का शब्दार्थ स्पष्ट करते ४. पञ्चसंग्रह, ५. आराधना ६. भावनाद्वात्रिंशिका, ७. चन्द्रप्रज्ञप्ति, हए वे गाथा के अभिप्राय को सरल संस्कृत में अभिव्यक्त करते हैं। ८. सार्द्धद्वयद्वीपप्रज्ञप्ति, ९. व्याख्याप्रज्ञप्ति। इनकी टीकाएँ निश्चय और व्यवहार का समन्वय लिए हुए हैं तथा - ये आचार्य कुन्दकुन्द के सप्रसिद्ध पारभाषक शब्दा क अथ इन्हान अच्छा तरह स्पष्ट परत पारिभाषिक शब्दों के अर्थ इन्होंने अच्छी तरह स्पष्ट किए हैं। ग्रंथ समयसार, प्रवचनसार और पंचास्तिकाय के टीकाकार के आचार्य नेमिचन्द्र सिद्धान्तचक्रवर्ती - आचार्य नेमिचन्द्र रूप में विख्यात हैं। ये टीकाएँ बड़ी प्रौढ़, अर्थगाम्भीर्य पूर्ण तथा सिद्धान्त चक्रवर्ती ने अभयनन्दि वीरनन्दि इंद्रनन्दि और ग्रन्थकार के हाई को अभिव्यक्त करने में सक्षम हैं। इनका काल कनकनन्दि इन चार गरुओं का स्मरण किया है। ये सभी दशवीं शताब्दी का अंतिम भाग माना जाता है। इनकी रचनाओं सिद्धान्तसमद्र के परगामी थे। बाहबलिचरित के अनसार जब में अध्यात्म और व्यवहार का सुन्दर समन्वय पाया जाता है। चामुण्डाराय अपनी माता के साथ गोम्मटसार की मूर्ति के दर्शन आचार्य कुन्दकुन्द के ग्रन्थों की टीकाएँ अध्यात्म प्रधान हैं तो के लिए पोदनपर गए थे तो नेमिचन्द्र भी उनके साथ थे। नेमिचन्द्र उनके साथ व्यवहर का सुमेल स्थापित करने के लिए अपने आचार्य को ही यह स्वप्न आया था कि विन्ध्यगिरि पर गोम्मटेश्वर तत्त्वार्थसार और पुरूषार्थसिद्धयुपाय का प्रणयन किया वे एक की मर्ति है। उसके पश्चात ही चामुण्डराय ने वहाँ मूर्ति की स्थापना अच्छे स्तुतिकार भी थे। अनेकान्त शैली का आश्रय लेकर २५- की और नेमिचन्द्र के चरणों में चामुण्डराय ने मूर्ति की पूजा के २५ छन्दों के २५ अधिकारों में उन्होंने तीर्थंकरों की स्तुति लिखी निमित्त ग्राम अर्पित किए, जिनकी आय ९६००० द्रव्यप्रमाण थी। है। यहाँ वे आचार्य समन्तभद्र की शैली को अपनाते हुए दिखाई आचार्य नेमिचन्द्र सिद्धान्त चक्रवर्ती की तीन रचनाएं प्राप्त हैं-- देते हैं। पुरुषार्थ सिद्धयुपाय में हिंसा-अहिंसा का जैसा सूक्ष्म (१) गोम्मटसार, (२) लब्धिसार और (३) त्रिलोकसार। वर्णन है, वैसा अन्यत्र विरल है। अमृतचन्द्रसूरि की निम्नलिखित गोम्मटसार और त्रिलोकसार की रचना विक्रम सं. १०३७-४० रचनाएँ हैं--१. पुरुषार्थ सिद्धयुपाय, २. तत्त्वार्थसार, ३. में हई है। नेमिचन्द्र देशियगण पस्तकगच्छ से संबंधित थे। यह समयसाकलश, ४. समयसारटीका, ५. प्रवचनसार टीका, ६. कन्दकन्दान्वय के नन्दिसंघ की शाखा थी। पंचास्तिकाय टीका और ७. लघुतत्त्वस्फोट। माधवचन्द्र त्रैविध्य -आचार्य नेमिचन्द्र के एक शिष्य माधवचंद्र आचार्य जयसेन (प्रथम) - आचार्य जयसेन प्रथम त्रैविध्य थे। उन्होंने अपने गुरु के द्वारा निर्मित त्रिलोकसार ग्रंथ पर लाडवागड संघ के आचार्य थे। इनकी गुरुपरंपरा इस प्रकार थी- संस्कत में टीका रची थी। उन्होंने अपनी टीकाकार प्रशस्ति wordwardroinorindabrwanoranardaniraniwaniriwari- ५९/6raniridworkwordwordsmiriramidnianiraniandard Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.211428
Book TitlePrachin Digambaracharya aur unki Sahitya Sadhna
Original Sutra AuthorN/A
AuthorRameshchandra Jain
PublisherZ_Yatindrasuri_Diksha_Shatabdi_Smarak_Granth_012036.pdf
Publication Year1999
Total Pages25
LanguageHindi
ClassificationArticle & Literature
File Size3 MB
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