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________________ - यतीन्द्रसरिस्मारक गन्ध - जैन आगम एवं साहित्य - श्रमणबेलगोला के एक अभिलेख में गृद्धपिच्छ नाम की कांच्यां नग्नाटकोऽहं मलमलिनतनुजीम्बुशे पाण्डुपिण्डः। सार्थकता और कुन्दकुन्द के वंश में उनकी उत्पत्ति बतलाते हुए पुण्ड्रोण्डु शाक्यभिक्षुः दशपुरनगरे मिष्टभोजी परिव्राट्। उनका उमास्वामि नाम भी दिया गया है। यथा - वाराणस्याम बभूवं शशधवधवलः पाण्डुरागस्तपस्वी। राजन् यस्याऽस्तिशक्तिः स वदतु पुरतो जैननिर्ग्रन्थवादी। अभूदुमास्वामि मुनिः पवित्रे वंशे तदीये सकलार्थवेदी। सूत्रीकृतं येन जिनप्रणीतं शास्त्रार्थजातं मुनिपुङ्गवेन।। मैं काञ्ची नगरी में दिगंबर साधु था। उस समय मेरा शरीर स प्राणिसंरक्षणसावधानो बभार योगी किल गृद्धपक्षान्। मलिन था। लम्बुशनगर में मैंने अपने शरीर में भस्म लगाई थी, तदा प्रभृत्येव बुधा यमाहुराचार्य शब्दोत्तरगृद्धपिच्छम्। उस समय मैं पाण्डरङ्ग था। मैंने पुण्ड्र नगर में बौद्धभिक्षु का रूप आचार्य कुन्दकुन्द के पवित्र वंश में सकलार्थ के ज्ञाता । धारण किया था। दशपुर नगर में मिष्टान्न भोजी परिव्राजक बना। वाराणसी में आकर मैंने चंद्र समान धवल कांतियुक्त शैव तपस्वी उमास्वाति मुनीश्वर हुए, जिन्होंने जिनप्रणीत द्वादशांग वाणी को का वेष धारण किया। हे राजन! मैं जैन निर्ग्रन्थ मुनि हूँ, जिसकी सूत्रों में निबद्ध किया। इन आचार्य ने प्राणिरक्षा हेतु गृद्धपिच्छों को धारण किया। तब से लेकर विद्वान इन्हें गद्धपिच्छाचार्य कहने लगे। शक्ति हो, वह मेरे समक्ष आकर शास्त्रार्थ करे। इस पद्य से ज्ञात होता है कि परिस्थितिवश आचार्य समन्तभद्र इस प्रकार दिगंबरसाहित्य तत्त्वार्थसूत्र के रचयिता को को भिन्न-भिन्न परम्पराओं के अनुसार साधुपद ग्रहण करना पड़ा, गृद्धपिच्छाचार्य अपरनाम उमास्वामि या उमास्वाति मानता है। ये किन्तु उनकी यथार्थ श्रद्धा जैन धर्म के प्रति थी। यही कारण है आचार्य कुन्दकुन्द के शिष्य थे। कुछ पाठभेद के साथ श्वेताम्बर कि उन्होंने गर्व के साथ अपने को कांची का नग्नाटक (नग्न परंपरा भी उमास्वाति की कृति तत्त्वार्थसूत्र को मानती है। इसमें भ्रमण करने वाला) और जैन निर्ग्रन्थवादी कहा है। तत्त्वार्थ का सूत्र रूप में विवेचन है, अतः इसे तत्त्वार्थसूत्र कहते हैं। तत्त्वार्थसूत्र के अर्थगाम्भीर्य को देखते इस पर अनेक टीकाएँ आचार्य समन्तभद्र का सम्पूर्ण भारतवर्ष में परिभ्रमण हुआ लिखी गईं, जिनमें पूज्यपाद कृत सर्वार्थसिद्धि.वाचक उमास्वातिकृत था। एक पद्य में उनके द्वारा कहलाया गया है कि पहले मैंने तत्त्वार्थाधिगमभाष्य, श्रीमद् भट्ट अकलंकदेव कृत तत्त्वार्थवार्तिक, पाटलिपुत्र (आधुनिक पटना) नगर में (वाद के हेतु) भेरी बजायी, विद्यानंद आचार्यकृत तत्त्वार्थश्लोकवार्तिक, भास्करनंदीकृत पश्चात् मालवा, सिन्धु, ठक्क (पंजाब), कांचीपुर (कांजीवरम्) भास्करीटीका, श्रुतसागरकृत श्रुतसागरी टीका, द्वितीय श्रुतसागरकृत और वैदिश में भेरी-ताडन किया। इसके पश्चात् मैं विद्वानों तथा तत्त्वार्थसुखबोधिनी टीका, विबुधसेनाचार्यकृत तत्त्वार्थटीका, शूरवीरों से समलङ्कत करहाटक देश में गया। हे नरपति ! मैं योगीन्द्रदेवकृत तत्त्वप्रकाशिका टीका, गृहस्थाचार्य योगदेवकृत शास्त्रार्थ का इच्छुक हूँ। मैं सिंह के समान निर्भय होकर विचरण तत्त्वार्थवृत्ति, गृहस्थाचार्य लक्ष्मीदेव कृत तत्त्वार्थ टीका तथा करता हूँ। अभयनन्दसूरि कृत टीका विशेष प्रसिद्ध है। इन टीकाओं से ही इस विक्रम संवत् ८४० में समाप्ति को प्राप्त पुन्नाट -संघीय ग्रंथ की महत्ता का पता चलता है। प्रोफेसर ए. चक्रवर्ती ने आचार्य आचार्य जिनसेन ने आचार्य समन्तभद्र के विषय में लिखा है-- कुन्दकुन्द का समय अनेक प्रमाणों के आधार पर ईसा की प्रथम जीवसिद्धिविधायीह कृतयुक्त्यनुशासनम्। शताब्दी निश्चित किया है। अतः उमास्वामी का समय प्रथम शताब्दी वचः समन्तभद्रस्य वीरस्येव विजृम्भते। .का अंत या द्वितीय शताब्दी का प्रारंभ निश्चित होता है। अर्थात् जिन्होंने जीवसिद्धि की रचना कर युक्त्यनुशासन आचार्य समन्तभद्र-स्वामी समन्तभद्र (विक्रम की दूसरी, बनाया। उन समन्तभद्र के वचन जिनेन्द्र भगवान् के वचनों के तीसरी शताब्दी) का जन्म क्षत्रियकल में हआ था। उनके पिता समान वृद्धि को प्राप्त हैं। फणिमण्डलान्तर्गत उरगपुर के राजा थे। उरगपुर पाण्ड्यदेश की राजधानी जान पड़ता है। श्री गोपालन ने इसकी पहचान उरैप्यूर यहाँ समन्तभद्राचार्य के वचनों को भगवान महावीर के से की है। श्रवणबेलगोल के विन्ध्यगिरि पर मल्लिषेणरचित वचनों के समान बतलाया है, इससे उनकी महत्ता सुस्पष्ट होती है। व एक शिलालेख में कहा गया है१६ - भगवज्जिनसेनाचार्य ने उन्हें कविब्रह्म कहकर नमस्कार సందరరరరరరరరరరwanand - రురురురురురువారం Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.211428
Book TitlePrachin Digambaracharya aur unki Sahitya Sadhna
Original Sutra AuthorN/A
AuthorRameshchandra Jain
PublisherZ_Yatindrasuri_Diksha_Shatabdi_Smarak_Granth_012036.pdf
Publication Year1999
Total Pages25
LanguageHindi
ClassificationArticle & Literature
File Size3 MB
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