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________________ २४६ आ. शांतिसागरजी जन्मशताब्दि स्मृतिग्रंथ सूत्रपात है। परमागम तत्त्व को कहता है । तत्त्व वस्तु का यथार्थ धर्म होता है। वस्तु स्वयं अनेकान्त रूप है इसलिए अनेकान्त परमागम का बीज सिद्ध है। नित्य-अनित्य, सत-असत् , एक-अनेक, भेद-अभेद ये परस्पर सापेक्ष अनेक धर्म (अन्त) स्वयं वस्तु के अंगभूत हैं। सूक्ष्मदृष्टि के अवलंबन करने पर इन धर्मो में सामंजस्य सहज ही प्रतीत होता है। इसकी भी आचार्य ने वन्दना की है। ग्रंथरचना की प्रतिज्ञा में लोकोत्तम पुरुषार्थसिद्धयुपाय ग्रंथ का अवतार विचक्षण विद्वानों के लिए है, इस स्पष्ट उल्लेख से ग्रंथ की लोकोत्तर श्रेणी स्वयं सुनिश्चित होती है । किसी भी वस्तुतत्त्व का वर्णन मुख्यरूप से ( स्वरूप प्रधान-निश्चय प्रधान ) और उपचाररूप से ( निमितप्रधान व्यवहारप्रधान ) होता है। अमूर्त चैतन्यघन पुरुष के (आत्मा के) यथार्थ ज्ञान के लिए उभय नयों का ज्ञान नितान्त आवश्यक होता है। स्वाश्रितो निश्चयः । शरीरादि से संयुक्त होनेपर भी आत्मा को विभक्त-एकत्व स्वरूप अर्थात् नोकर्म और भाव कर्मों से पृथक् और अपने गुणपर्यायों से तन्मय जानकर ही जीव स्वयं को शुद्ध अनुभव कर सकता है । इस शुद्ध स्वरूप को 'भतार्थ', 'परमार्थ' कहते है और इसे जाननेवाले नय को निश्चय नय तथा कथन को अनुपचरित कथन कहते हैं। पराश्रितो व्यवहारः । शरीरादि परद्रव्यों के आश्रय से आत्मा को जानना जैसे यह आत्मा मनुष्य है, इत्यादि कथन उपचार कथन है। और ऐसा ज्ञान व्यवहारनय द्वारा होता है। इसका विषय अर्थात् अभूतार्थ है । निरपवाद वस्तुतत्व के परिज्ञान के लिए निम्न लिखित सूत्रों को हृदयंगम करने से आगामी आचार विषयक किसी प्रकार को विकल्प नहीं रहेगा । यह दृष्टि आचार की आधारशिला है सिद्धशिला तुल्य स्वयं सिद्ध है। निश्चय भूतार्थ (वस्तुस्वरूप ) और व्यवहार अभूतार्थ (अवस्तुस्वरूप ) है। व्यवहार और निश्चय को यथार्थ जाननेवाले ही विश्व में तीर्थ निर्माता होते है। निश्चय श्रद्धासे विमुख व्यक्ति परद्रव्य में एकत्व प्रवृत्ति करता है । यही संसार है । अज्ञानी को तत्त्व समझाने मात्र के लिए ‘घी के घडे' की तरह व्यवहार कथन मात्र उपचार प्रयोग होता है। ___ उपदेश के यथार्थ फल के इच्छुकों को निश्चय और व्यवहार दोनों को यथार्थ जान कर मध्यस्थ होना अनिवार्य है। परमार्थ से पराड्मुख व्रत-तप बालव्रत बालतप है वे निर्वाण के कारण नहीं। उनमें समीचीन दृष्टि नहीं है और रागद्वेष की सत्ता भी है । ___ चारित्र, शुद्धिस्वरूप है उसे पुण्यबंध का कारण मानना अज्ञानता है । बंध के कारण मिथ्याध्यवसायरागद्वेष होते है, न कि शुद्धि और वीतरागता । आत्मा के श्रद्धानज्ञान-स्थिरतारूप मोक्षमार्ग को न पहिचानकर केवल व्यवहाररूप दर्शन ज्ञान चारित्र की साधना को मोक्षमार्ग माननेवाले-शुभोपयोग में सन्तुष्ट होते है शुद्धोपयोगरूप मोक्षमार्ग में प्रमादी होते Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.211368
Book TitlePurusharth Siddhyupaya
Original Sutra AuthorN/A
AuthorManikchand Chavre
PublisherZ_Acharya_Shantisagar_Janma_Shatabdi_Mahotsav_Smruti_Granth_012022.pdf
Publication Year
Total Pages11
LanguageHindi
ClassificationArticle & Achar
File Size846 KB
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