SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 2
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ के कारण हमारे मन में आत्मविश्वास और अभिमान को एक ऐसी मनोदशा उत्पन्न हो गई है, जिसके कारण हमने प्रकृति के ज्ञान का संचय और मानवीकरण करने की बजाय उसका शोषण करना प्रारंभ कर दिया है। हमारे सामाजिक जीवन ने हमें साधन तो दिए है, पर लक्ष्य प्रदान नहीं किए। हमारी पीढ़ी के लोगों पर एक भयानक अंधता छा गई है। इस अंधता का उपाय कौन खोजेगा ? कहीं से कोई प्रकाश किरण फूट सकती है, तो वह मनुष्य ही है जो स्वरूप आज हमारे सामने है, उसी में से एक ऐसे संसार की रचना करनी होगी, ऐसा समाज 'गढ़ना' होगा, जो सत्य, करुणा और सृजनशीलता पर अवलंबित हो। | जैन धर्म संसार का वह पहला और अब तक आखिरी धर्म है जिस ने धर्म का मूलाधार पर्यावरण सुरक्षा को मान्य किया है भगवान महावीर का सब से पहला उपदेश आचारांग में संकलित किया गया। आचारांग का पहला अध्ययन षट्काय जीवों की रक्षार्थं रचा गया। महावीर ने स्पष्टतः जोर दे कर निर्देशा कि पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि, वनस्पति और त्रसकाय जीव जीव हैं. साक्षात प्राणधारी जीव इन्हें अपने ढंग से जीने देना धर्म है, इन्हें कष्ट पहुंचाना या नष्ट करना हिंसा है, पाप है। अहिंसा परम धर्म है और हिंसा महापाप । इन्हीं षट्काय जीवों की संतति पुरानी शब्दावली में संसार और आधुनिक शब्दावली में पर्यावरण से अभिहित है। अपने संयत और सम्यक् आचरण से इस षट्कायिक पर्यावरणीय संहति की रक्षा करना जैन धर्म का मूलाधार है। जैन धर्म ने ही सब से पहले पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि और वनस्पतियों को जीव कहा उसकाय जीवों को तो और भी विचारक जीव या प्राणी मानते रहे। इधर आ कर विज्ञान ने सर जगदीश चन्द्र बसु की खोज के आधार पर वनस्पतियों को जीव मानना प्रारम्भ कर दिया, किन्तु अब घटकायों के पहले चार काय, पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि को जीव श्रेणी में केवल जैन ही रखते हैं और उन्हें अन्य जीवों की भांति अपने धर्माचार में स्थान दिए हुए हैं। इस आस्थागत अवधारणा के आधार पर न केवल यह पृथ्वी प्रत्युत् ब्रह्माण्ड की सारी पृथ्वियाँ, यथा — ग्रह, उपग्रह तथा नक्षत्र, सम्पूर्ण वायु मण्डल, जलाशय तथा अग्निस्रोत सब के सब एकेन्द्रिय जीव है जिनके अधीन असंख्यात त्रसकाय जीवों की द्विन्द्रिय से लेकर पंचेन्द्रिय योनियाँ आश्रय लिए हुए हैं। इस प्रकार जैन मान्यता के अनुसार सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड अथवा लोक रचना जीवतत्व से ओत-प्रोत है। सम्पूर्ण लोक जीवंत है। अतः - शिक्षा एक यशस्वी दशक Jain Education International सम्पूर्ण पर्यावरण एक जीवंत इकाई है। जैन धर्म का दार्शनिक आधार यह है कि सम्पूर्ण लोकरचना में जीव तत्व की प्रमुख भूमिका है। उसी के उपग्रह से संसार का सामूहिक जीवन स्थिर है उसी के निमित्त से लोकरचना का सम्पूर्ण पर्यावरण जीवंत है। जैन धर्म का नारा है "जिओ और जीने दो'। इस "जिओ और जीने दो में पर्यावरण के जीव तत्व के प्रति आदर का भाव निहित है। और पर्यावरण की जैन अवधारणा में शामिल है - पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि, उर्जा, पेड़-पौधे, वनस्पतियां, हर प्रकार के कीट-पतंग, जीव-जंतु, स्वयं मनुष्य, और यहां तक कि न दिखाई देने वाली देव नारक योनियां भी इस समग्र पर्यावरण का आदर तात्पर्य इसे अपनी तरह जीने और मरने का मौलिक अधिकार की स्वीकृति, दूसरे शब्दों में, पर्यावरण सुरक्षा, स्वयं पर्यावरण के जीव तत्व के द्वारा पर्यावरणीय सुख के लिए उसमें किसी प्रकार की दखलंदाजी दिए बिना जैन धर्माचार की मूल अवधारणा है। जैन पर्यावरण को मनुष्य के सुख का उपकरण मात्र नहीं मानते। पर्यावरण की अक्षमता का लाभ उठाते हुए उसे अपना गुलाम बनाना, अपनी लिप्सा के लिए उन का विनाश या तोड़-फोड़ करना जैनों की निगाह में घोर मानवीय अपराध है, जिस कारण हिंसक मनुष्य घोर नारकीय दुःखों का बंध करता है और अपनी दुःख श्रृंखला को कभी न समाप्त होने वाली आयु प्रदान करता है। पर्यावरण को अपने ढंग से जीने देना, उस में कम से कम दखलंदाजी करना पर्यावरण सुरक्षा की स्वाभाविक गारंटी है। मितव्ययता जैन धर्म दर्शन के व्यावहारिक पहलू की रीढ़ है मितव्ययता की परिभाषा है- विवेकसम्मत आवश्यकता की पूर्ति के लिए कम से कम वस्तुओं का उपभोग । मितव्ययता की पूर्व शर्त है, वैराग्य और त्याग भाव, जिस से फलित होती है पर वस्तुओं की लिप्सा की कमी कम हो चुकी या होती हुई लिप्साओं से परवस्तुओं की कम से कम आवश्यकताओं की अनुभूति पैदा होती है। कम होती हुई आवश्यकताओं का मापदण्ड है- वस्तुओं का कम से कम मितव्ययीय उपयोग जीने के हर कदम पर जैन मितव्ययता सूत्र को लागू करते हैं। जितनी कम से कम जरूरत हो उसी के मुताबिक खनिज, हवा, पानी, उर्जा, वनस्पतियां, त्रस जीवों के शरीर और उन की सेवाएं उपभोग में ली जाएं। जिस आचरण से किसी जीव के सर्वथा प्राणहरण हो जाएं उससे बचा जाए। For Private & Personal Use Only विद्वत् खण्ड / ६९ www.jainelibrary.org
SR No.211329
Book TitleParyavaran Samrakshan aur Jain Dharm
Original Sutra AuthorN/A
AuthorPrem Suman Jain
PublisherZ_Jain_Vidyalay_Granth_012030.pdf
Publication Year2002
Total Pages6
LanguageHindi
ClassificationArticle & 0_not_categorized
File Size804 KB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy