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________________ 55 नियुक्ति साहित्य : एक पुनर्चिन्तन ग्रन्थ मूलाचार में न केवल शताधिक नियुक्ति गाथाएँ उदधृत हैं, अपितु में वस्त्र-पात्र के उल्लेख अधिक बाधक नहीं हैं। उसमें अस्वाध्याय काल में नियुक्तियों के अध्ययन न करने का निर्देश 4. चूँकि आर्यभद्र के निर्यापक आर्यरक्षित माने जाते हैं। नियुक्ति भी है। इससे फलित होता है कि नियुक्तियों की रचना मूलाचार से और चूर्णि दोनों से ही यह सिद्ध है कि आर्यरक्षित भी अचेलता के पूर्व हो चुकी थी। यदि मूलाचार को छठीं सदी की रचना भी मानें ही पक्षधर थे और उन्होंने अपने पिता को, जो प्रारम्भ में अचेल दीक्षा तो उसके पूर्व नियुक्तियों का अस्तित्व तो मानना ही होगा, साथ ही ग्रहण करना नहीं चाहते थे, योजनापूर्वक अचेल बना ही दिया था। यह भी मानना होगा कि नियुक्तियाँ मूलरूप में अविभक्त धारा में निर्मित चूर्णि में जो कटिपट्टक की बात है, वह तो श्वेताम्बर पक्ष की पुष्टि हुई थीं। चूँकि परम्परा भेद तो शिवभूति के पश्चात् उनके शिष्यों कौडिन्य हेतु डाली गयी प्रतीत होती है। और कोट्टवीर से हुआ है। अत: नियुक्तियाँ शिवभूति के शिष्य भद्रगुप्त भद्रगुप्त को नियुक्ति का कर्ता मानने के सम्बन्ध में निम्न कठिनाइयाँ की रचना मानी जा सकती है, क्योंकि वे न केवल अविभक्त धारा हैंमें हुए अपितु लगभग उसीकाल में अर्थात् विक्रम की तीसरी शती 1. आवश्यकनियुक्ति एवं आवश्यकचूर्णि के उल्लेखों के अनुसार में हुए हैं, जो कि नियुक्ति का रचना काल है। / आर्यरक्षित भद्रगुप्त के निर्यापक (समाधिमरण कराने वाले) माने गये। 2. पुन: आचार्य भद्रगुप्त को उत्तर-भारत की अचेल परम्परा / आवश्यकनियुक्ति न केवल आर्यरक्षित की विस्तार से चर्चा करती है, का पूर्वपुरुष दो-तीन आधारों पर माना जा सकता है। प्रथम तो कल्पसूत्र अपितु उनका आदरपूर्वक स्मरण भी करती है। भद्रगुप्त आर्यरक्षित की पट्टावली के अनुसार आर्यभद्रगुप्त आर्यशिवभूति के शिष्य हैं और से दीक्षा में ज्येष्ठ हैं, ऐसी स्थिति में उनके द्वारा रचित नियुक्तियों ये शिवभूति वही हैं जिनका आर्यकृष्ण से मुनि की उपधि (वस्त्र-पात्र) में आर्यरक्षित का उल्लेख इतने विस्तार से एवं इतने आदरपूर्वक नहीं के प्रश्न पर विवाद हुआ था और जिन्होंने अचेलता का पक्ष लिया आना चाहिए। यद्यपि परवर्ती उल्लेख एकमत से यह मानते हैं कि था। कल्पसूत्र स्थविरावली में आर्य कृष्ण और आर्यभद्र दोनों को आर्य आर्यभद्रगुप्त की निर्यापना आर्यरक्षित ने करवायी, किन्तु मूल गाथा शिवभूति का शिष्य कहा है। चूँकि आर्यभद्र ही ऐसे व्यक्ति हैं जिन्हें को देखने पर इस मान्यता के बारे में किसी को सन्देह भी हो सकता आर्यवज्र एवं आर्यरक्षित के शिक्षक के रूप में श्वेताम्बरों में और शिवभूति है, मूल गाथा निम्नानुसार हैके शिष्य के रूप में यापनीय परम्परा में मान्यता मिली है। पुनः "निज्जवण भगुत्ते वीसं पढणं च तस्स पुव्वगयं। आर्यशिवभूति के शिष्य होने के कारण आर्यभद्र भी अचेलता के पक्षधर पव्याविओ य भाया रक्खिअखमणेहिं जणओ अ"। होंगे और इसलिए उनकी कृतियाँ यापनीय परम्परा में मान्य रही होंगी। - आवश्यकनियुक्ति, 776 / 3. विदिशा से जो एक अभिलेख प्राप्त हुआ है उसमें भद्रान्वय यहाँ “निज्जवण भद्दगुत्ते" में यदि 'भद्दगुत्ते' को आर्ष प्रयोग मानकर एवं आर्यकुल का उल्लेख है कोई प्रथमाविभक्ति में समझे तो इस गाथा के प्रथम दो चरणों का शमदमवान चीकरत् (11) आचार्य- भद्रान्वयभूषणस्य अर्थ इस प्रकार भी हो सकता है- भद्रगुप्त ने आर्यरक्षित की निर्यापना शिष्यो ह्यसावार्यकुलोद्गतस्य (1) आचार्य- गोश की और उनसे समस्त पूर्वगत साहित्य का अध्ययन किया। (जै.शि.सं. 2, पृ० 57) गाथा के उपर्युक्त अर्थ को स्वीकार करने पर तो यह माना जा सम्भावना यही है कि भद्रान्वय एवं आर्यकुल का विकास इन्हीं सकता है कि नियुक्तियों में आर्यरक्षित का जो बहुमान पूर्वक उल्लेख आर्यभद्र से हुआ हो। यहाँ के अन्य अभिलेखों में मुनि का है, वह अप्रासंगिक नहीं है। क्योंकि जिस व्यक्ति ने आर्यरक्षित की 'पाणितलभोजी' ऐसा विशेषण होने से यह माना जा सकता है कि निर्यापना करवायी हो और जिनसे पूर्वो का अध्ययन किया हो, वह यह केन्द्र अचेल धारा का था। अपने पूर्वज आचार्य भद्र की कृतियाँ उनका अपनी कृति में सम्मानपूर्वक उल्लेख करेगा ही। किन्तु गाथा होने के कारण नियुक्तियाँ यापनीयों में भी मान्य रही होगी। ओघनियुक्ति का इस दृष्टि से किया गया अर्थ चूर्णि में प्रस्तुत कथानकों के साथ या पिण्डनियुक्ति में भी जो कि परवर्ती एवं विकसित हैं, दो चार प्रसंगों एवं नियुक्ति गाथाओं के पूर्वापर प्रसंग को देखते हुए किसी भी प्रकार के अतिरिक्त कहीं भी वस्त्र-पात्र का विशेष उल्लेख नहीं मिलता है। संगत नहीं माना जा सकता है। चूर्णि में तो यही कहा गया है कि यह इस तथ्य का भी सूचक है कि नियुक्तियों के काल तक वस्त्र-पात्र आर्यरक्षित ने भद्रगुप्त की निर्यापना करवायी और आर्यवज्र से आदि का समर्थन उस रूप में नहीं किया जाता था, जिस रूप में परवर्ती पूर्वसाहित्य का अध्ययन किया। यहाँ दूसरे चरण में प्रयुक्त “तस्स" श्वेताम्बर सम्प्रदाय में हुआ। वस्त्र-पात्र के सम्बन्ध में नियुक्ति की मान्यता शब्द का सम्बन्ध आर्यवज्र से है, जिनका उल्लेख पूर्व गाथाओं में भगवती आराधना एवं मूलाचार से अधिक दूर नहीं है। आचारांगनियुक्ति किया गया है। साथ ही यहाँ ‘भद्दगुत्ते' में सप्तमी का प्रयोग है, जो में आचारांग के वस्त्रेषणा अध्ययन की नियुक्ति केवल एक गाथा में एक कार्य को समाप्त कर दूसरा कार्य प्रारम्भ करने की स्थिति में किया समाप्त हो गयी है और पात्रैषणा पर कोई नियुक्ति गाथा ही नहीं है। जाता है। यहाँ सम्पूर्ण गाथा का अर्थ इस प्रकार होगा- आर्यरक्षित अत: वस्त्र-पात्र के सम्बन्ध में नियुक्तियों के कर्ता आर्यभद्र की स्थिति ने भद्रगुप्त की निर्यापना (समाधिमरण) करवाने के पश्चात् (आर्यवज्र भी मथुरा के साधु-साध्वियों के अंकन से अधिक भिन्न नहीं है। अत: से) पूर्वो का समस्त अध्ययन किया है और अपने भाई और पिता नियुक्तिकार के रूप में आर्य भद्रगुप्त को स्वीकार करने में नियुक्तियों को दीक्षित किया। यदि आर्यरक्षित भद्रगुप्त के निर्यापक हैं और वे Jain Education Interational For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.211277
Book TitleNiryukti Sahitya Ek Punarchintan
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSagarmal Jain
PublisherZ_Shwetambar_Sthanakvasi_Jain_Sabha_Hirak_Jayanti_Granth_012052.pdf
Publication Year1998
Total Pages6
LanguageHindi
ClassificationArticle & Agam
File Size2 MB
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