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________________ साध्वीरत्न पुष्पवती अभिनन्दन ग्रन्थ भांति निःश्रेयस की प्राप्ति हेतु उसी उत्साह से सतर्क थीं । जैन आगम में जयन्ती श्राविका के विदुषी होने का जिक्र है। भगवान महावीर की माता त्रिशला स्वयं विदुषी थी। हालांकि भगवान बुद्ध को अपने संघ में भिक्षुणी को स्थान देने में काफी हिचकिचाहट थी । वे अपनी मौसी गौतमी को भी अपने शिष्य आनन्द के आग्रह से दीक्षित करने के बाद भी बड़े भयभीत थे । यह सत्य है कि ब्राह्मण परम्परा में सूत्र तथा स्मृतिकाल में महिलाओं पर प्रतिबन्ध अधिक कड़े होते गये । कटु सत्य है कि महिलाओं के सम्बन्ध में निन्दात्मक उल्लेख, टिप्पणियाँ आदि भी जैन परम्परा में कम नहीं हैं किन्तु यदि हम गहराई से सोचें तो उनके कर्ता ने महिलाओं के आकर्षक सौन्दर्य से कामुक साधु की रक्षा के ख्याल से स्त्री- चरित्र को बदनाम करने का प्रयत्न किया है । संस्कृत में कहा गया है "घृतकुम्भसमा नारी, तप्तांगारसमो पुमान्" । नारी घी के घड़े के समान है तथा तपते हुए अंगारे के मुताबिक पुरुष होता है । यह कैसे सम्भव है कि केवल महिला ही सब दोषों की जननी हो गई । इस सम्बन्ध में डॉ० जगदीशचन्द्र जैन ने अपनी पुस्तक " जैन आगम साहित्य में भारतीय समाज' पृष्ठ २४६ में बृहत्संहिता के कर्ता वराहमिहिर का हवाला देकर लिखा है : "जो दोष स्त्रियों में बताये जाते हैं वे पुरुषों में भी मौजूद हैं । अन्तर इतना है कि स्त्रियां उन्हें दूर करने का प्रयत्न करती हैं, जबकि पुरुष उनसे बेहद उदासीन रहते हैं । विवाह की प्रतिज्ञाएँ वर-वधू दोनों ही ग्रहण करते हैं, लेकिन पुरुष उन्हें साधारण मानकर चलते हैं, जबकि स्त्रियाँ उन पर आचरण करती हैं । काम-वासना से कौन अधिक पीड़ित होता है ? पुरुष, जो वृद्धावस्था में भी विवाह करते हैं । पुरुष के लिए यह कहना कि स्त्रियाँ चंचल होती हैं, दुर्बल होती हैं, और अविश्वसनीय होती हैं, धृष्टता और कृतघ्नता की चरम सीमा है । इससे कुशल चोरों की याद आती है जो पहले तो अपना लूटा अन्यत्र भिजवा देते हैं और फिर निरपराधो पुरुषों को चुनौती देते हुए उनसे अपने धन की मांग करते हैं । इसके अतिरिक्त यह भी ज्ञातव्य है कि महिलाओं ने पुरुष को पतन के मार्ग से उन्मुख करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। भोजराज उग्रसेन की कन्या राजीमति ने भगवान अरिष्टनेमि के वैराग्य अवस्था का अनुगमन कर लिया था । रथनेमि तथा राजीमति गिरनार पर्वत पर तपस्या में लीन थे । राजीमति के एक गुफा में प्रवेश करने पर रथनेमि ने उस पर आसक्त होकर पतन का मार्ग अपनाना चाहा किन्तु राजीमति की फटकार के कारण वह सजग हो गया तथा पतन से बच गया । और भी उदाहरण दिये जा सकते हैं । संभवतः ऐसी नारी - रत्न के लिये ही एक प्राचीन विद्वान ने कहा था "यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता" । जहाँ नारी की पूजा होती है, उसे आदर दिया जाता है वहाँ देवता रमण करते हैं । तात्पर्य यह है कि पुरुष हो चाहे नारी यदि विवेकशील है और उनका हृदय और आचरण पवित्र है तो परिवार, समाज और राष्ट्र सुखी होगा । यह आवश्यक नहीं है कि केवल महिला का हृदय ही कलुषित होता है इस कारण उनका आचरण सदैव अपवित्र होता है। एक चीनी लोकोक्ति में कहा गया है— "अगर तुम्हारा हृदय पवित्र है तो तुम्हारा आचरण भी सुन्दर होगा, तुम्हारा आचरण सुन्दर नारी जीवन जागरण : सौभाग्यमल जैन | २५७ www.ja
SR No.211259
Book TitleNari Jivan Jagaran
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSaubhagyamal Jain
PublisherZ_Sadhviratna_Pushpvati_Abhinandan_Granth_012024.pdf
Publication Year1997
Total Pages5
LanguageHindi
ClassificationArticle & Jain Woman
File Size693 KB
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